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झाबुआ: जनजातीय परंपरा का रोमांचकारी गल पर्व सम्पन्न; 25 फीट ऊंचे मचान से हवा में घुमाए गए मन्नतधारी

Date : 14-Mar-2025


झाबुआ, 14 मार्च । जिले में भगोरिया उत्सव ओर मन्नत धारियों द्वारा होली परिक्रमा के बाद शुक्रवार को जिले के करीब डेढ़ दर्जन स्थानों पर जनजातीय समुदाय का परंपरागत, धार्मिक एवं सांस्कृतिक गल पर्व बड़े ही हर्षोल्लास पूर्वक मनाया गया। आयोजन में गल घूमने आए मन्नत धारियों, दूरस्थ अंचलों से बड़ी संख्या में आए समाजजनों सहित नगरीय क्षेत्रों से आए लोग मौजूद रहे। इस वर्ष फसलें अच्छी हुई है और लाड़ली बहनों की जेब में भी खासा रुपया है, ऐसे में इस उत्सव का मज़ा कुछ ज्यादा ही दिखाई पड़ा। इस साल विभिन्न स्थानों पर आयोजित गल उत्सव के दौरान जिले के झाबुआ जनपद के मिंडल, पेटलावद जनपद क्षैत्र के रायपुरिया एवं रामनगर, मेघनगर जनपद क्षैत्र के जरात ओर मालखंडवी एवं थांदला जनपद के मछलईमाता सहित जिले के करीब डेढ़ दर्जन स्थानों पर शुक्रवार को परंपरागत गल उत्सव हर्षोल्लास पूर्वक धूमधाम से मनाया गया। आयोजित गल उत्सव में कोई 50 से भी अधिक मन्नतधारियों ने गल देव की विधिवत पूजा अर्चना कर एवं गल घूमकर अपनी मन्नत पूरी की। उत्सव के आरम्भ में जनजातीय धार्मिक परंपरानुसार गल देव की विधि वत पूजा अर्चना की गई और फिर अद्भुत एवं हैरतअंगेज गल घुमाए जाने की कठिन प्रक्रिया आरम्भ हो गई। गल उत्सव के साथ ही अब शनिवार से उजाड़िया हाट शुरू हो जाएंगे, जो आने वाले सात दिनों तक विभिन्न स्थानों पर लगेंगे।

उल्लेखनीय है कि जिले के जनजातीय धार्मिक परंपराओं का यह गल उत्सव वस्तुतह अपनी मन्नत पूरी होने के बाद गल देवता के सम्मुख उपस्थित होकर ओर गलदेव की पूजा अर्चना कर मानी गई मन्नत उतारने की प्रक्रिया है, जिसमें मन्नत धारी पुरुष करीब 25 फीट ऊंचे मचान पर बल्लियों के सहारे बांधा जाकर गोलाकार रूप में हवा में घुमाया जाता है। गल के इस परम्परागत उत्सव में आदिवासियों द्वारा अपनी परम्परागत विधि से प्रथम गल देवता की पूजा सम्पन्न की जाती है, फिर उत्सव की शुरुआत होती है. गल चढ़ने की यह सम्पूर्ण क्रिया अत्यंत रोमांचकारी है, जिसमें गल चढने वाला व्यक्ति (यह मन्नतधारी होता है, जिसे आदिवासी लोग लाडा कहते हैं.) को करीब 20 से 25 फीट ऊंचे बने मचान पर लकड़ी की लंबी , मोटी बल्ली से भलीभांति बांध दिया जाता है, जबकि बल्ली के दूसरे सिरे पर रस्सी बांध दी जाती है, जिसके आखरी सिरे को पकड़ कर नीचे खड़े व्यक्ति द्वारा मचान के आसपास तेजी से दौड़ लगाते हुए उसे गोलाकार घुमाया जाता है। 

जिले के मेघनगर जनपद क्षैत्र के ग्राम जरात एवं खालखंडवी और थांदला जनपद क्षेत्र के ग्राम मछलाईमाता सहित करीब डेढ़ दर्जन गांवों में शुक्रवार को आयोजित गल उत्सवों में ऐसा ही मिला-जुला किंतु हैरतअंगेज नज़ारा देखा गया। उक्त अंचलों में आयोजित गल उत्सव में शामिल होने के लिए दोपहर बाद से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया, और उत्सव का आरम्भ होते ही पुरूष अपने परंपरागत वाद्य यंत्रों ढोल, मांदल और थाली बजाते हुए और गोलाकार घेरा बनाते हुए सामुहिक रूप से नृत्य करने लगे, और जब मन्नतधारी व्यक्ति के गल चढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई तो ये लोग उद्धाम नृत्य करने लगे। गल घुमाए जाने के पहले जनजाति परंपरा अनुसार सर्व प्रथम गल देवता की विधिवत पूजा अर्चना की गई, ओर फिर एक के बाद एक, सब मन्नतधारियों को (जिन्हें लाडा कहा जाता है) 25 फीट ऊचे मचान पर चढ़ाकर गोलाकार रूप से घुमाया जाने लगा। इस समूची प्रक्रिया को गल चढ़ना या घूमना कहते हैं. जो व्यक्ति गल घूमता है, उसकी कोई मन्नत ली हुई होती है, जिसके पूरी होने पर वह गल घूमता है। ।



होली के दूसरे दिन धुलेंडी पर प्रतिवर्ष यह उत्सव आयोजित किया जाता है। उक्त सभी स्थानों पर गल घुमाए जाने के पहले जनजातीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार गल देवता की पूजा अर्चना की गई, तत्पश्चात एक के बाद एक मन्नत धारी को 20 से 25 फीट ऊंचे मचान पर ले जाया गया, जहां से उसे गले घुमाया गया। इधर जब लाडे को गले घुमाए जाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो मन्नतधारी लाडे के परिजन सहित उत्सव में शामिल अन्य लोग ढोल, मांदल और थाली बजाते हुए सामुहिक रूप से उद्धाम नृत्य करने लगे, और महिलाएं गीत गाने लगी। यह सिलसिला प्रत्येक मन्नतधारी के गले घूमने पर चलता रहा। कुछ स्थानों पर चूल का भी आयोजन हुआ। शनिवार से उजाड़िया हाट शुरू हो जाएंगे, जो सप्ताह भर जारी रहेंगे।


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