झारखंड-बिहार सीमा पर स्थित माता कौलेश्वरी मंदिर: आस्था, इतिहास और अध्यात्म का संगम | The Voice TV

Quote :

"मेहनत का कोई विकल्प नहीं, बस मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ते रहो।"

Travel & Culture

झारखंड-बिहार सीमा पर स्थित माता कौलेश्वरी मंदिर: आस्था, इतिहास और अध्यात्म का संगम

Date : 11-Apr-2025

झारखंड और बिहार की सीमा पर, चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित कोल्हुआ पहाड़ी पर 1755 फीट की ऊंचाई पर माता कौलेश्वरी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि रामायण और महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ है।

पौराणिक इतिहास से जुड़ा स्थल

मान्यता है कि द्वापर युग में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने द्रौपदी के साथ इस स्थान पर निवास किया था और माता कौलेश्वरी की आराधना की थी। यह स्थल राजा विराट की राजधानी माना जाता है। राजा विराट द्वारा ही माता की प्रतिमा पहाड़ी की चोटी पर स्थापित करवाई गई थी। इसी स्थान पर पुराणों में वर्णित राजा सूरथ ने भी तपस्या की थी।

रामायण काल में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने भी अपने वनवास के दौरान यहां कुछ समय व्यतीत किया था। मंदिर के पास स्थित "भीम गुफा" और "आकाश लोचन" जैसे स्थानों से इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता और भी गहराई से जुड़ जाती है।

मां कौलेश्वरी की दिव्यता

माता कौलेश्वरी की प्रतिमा दुर्लभ काले पत्थर से बनी हुई लगभग 5 फीट ऊंची है और यह चतुर्भुजी स्वरूप में विराजमान हैं। दुर्गा सप्तशती में इनका उल्लेख कुत्क्षो रक्षेत कुलेश्वरीश्लोक के माध्यम से मिलता है। मान्यता है कि माता कौलेश्वरी कुल व संतान की रक्षा करती हैं और संतान प्राप्ति की कामना को लेकर यहां भक्तों का सालों भर आना-जाना लगा रहता है।

नवरात्र के समय यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं। मन्नतें पूरी होने पर भक्त यहां मुंडन संस्कार और बली अर्पण करने आते हैं, जिनमें न सिर्फ देश के कोने-कोने से, बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु शामिल होते हैं।

तीन धर्मों का संगमस्थल

माता कौलेश्वरी का यह मंदिर सिर्फ हिंदू धर्म के लिए नहीं, बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों के लिए भी पवित्र स्थल है। बौद्ध मान्यताओं के अनुसार, भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में पहला उपदेश देने से पहले यहां कुछ दिन तपस्या की थी। वहीं, जैन धर्म के अनुसार यह स्थान 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ का जन्म स्थान माना जाता है।

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर तीर्थक्षेत्र

40 एकड़ में फैले इस पहाड़ी क्षेत्र में एक प्राचीन सरोवर भी स्थित है, जिसमें पूरे साल जल बना रहता है। यह मंदिर मोक्षदायिनी फल्गु नदी (जिसे निरंजना भी कहा जाता है) के किनारे स्थित है, जो इसकी आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।

विदेशों तक प्रसिद्धि

झारखंड का यह एकमात्र धार्मिक स्थल है, जहां विदेशी श्रद्धालु सर्वाधिक संख्या में धार्मिक अनुष्ठानों के लिए पहुंचते हैं। यहां सनातन धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के अनुयायी अपनी-अपनी आस्था के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।

आचार्य चेतन पांडेय के अनुसार, माता कौलेश्वरी का मंदिर आस्था का ऐसा केंद्र है जहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। यही वजह है कि यह तीर्थक्षेत्र न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश और विदेशों में भी आस्था का प्रतीक बन गया है।

 


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement