भारतीय धर्म ग्रंथ कहते हैं। जब राजा, प्रजा, पुत्र, पिता, मित्र, सैन्य, सभी अपने कर्तव्यों का उचित प्रकार से पालन करें तो स्वाभाविक है, सभी के अधिकार तो स्वयं ही संरक्षित हो जाएंगे यही है। मानव अधिकार अवधारणा आज पूरे विश्व के लिए भारत के प्राचीन ग्रंथ मानव अधिकार संरक्षण के सबसे मूल्यवान ग्रंथ है।
पूरे विश्व में औपनिवेशिक अधिकारिता और साम्राज्यवाद को चलाने वाले अमेरिका, ब्रिटेन, डच और पुर्तगाली चर्च की मानसिकता से प्रेरित पूरे विश्व को एक झंडे के नीचे लाने की कोशिश करती समुद्री डाकुओं की सेनाओं द्वारा तीसरी दुनिया के सारे देश अर्थात अफ्रीका-भारत दक्षिण पूर्व एशिया जैसे प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति और सभ्यता से परिपूर्ण क्षेत्रों को लूटने लाखों स्थानीय निवासियों की हिंसा करने और उनका धर्म परिवर्तन करने के पश्चात प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध आपस में लड़ा पूरे विश्व के संसाधनों को तहस-नहस कर दिया।
अधिकार राजसत्ता तथा अंतरराष्ट्रीय समझौते के द्वारा प्रतिबंधित किए जा सकते हैं; पर 'स्वत्व' न तो प्राधिकार (Privilege) है, न नैसर्गिक अधिकार, क्योंकि वह अहरणीय है। 'मुक्त वायु' दैहिक स्वतंत्रता की कल्पना है। मेरे बचपन में मेरी माँ गाय को दुहने के समय के अतिरिक्त बाँधकर रखना गर्हित समझती थीं। उसे बाड़े में, जिसके किनारे गोशाला का छप्परयुक्त कमरा था, छोड़ देते थे। केवल अपराधी को ही निरूद्घ किया जा सकता था। पालतू चिड़ियों और पशुओं को पिंजरे या कठघरे में बंद रखना नीच कर्म माना गया। इन अधिकारों की मान्यता मानव मूल्यों को चरितार्थ करने के लिए मनुष्य के लंबे संघर्ष के बाद हुई है। मानव अधिकार का विचार अनेक विधिक प्रणालियों में पाया जा सकता है। प्राचीन भारतीय विधिक प्रणाली, जो विश्व की सबसे प्राचीन विधिक प्रणाली है, इन अधिकारों की संकल्पना नहीं थी, केवल कर्तव्यों को ही अधिकथित किया गया था। यहाँ के विधि शास्त्रियों की मान्यता थी कि यदि सभी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करने तो सभी के अधिकार संरक्षित रहेंगे। प्राचीन भारत के धर्मसूत्रों एवं धर्मशास्त्रों की विशाल संख्या में लोगों के कर्तव्यों का ही उल्लेख है।
धर्म एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ बहुत विस्तृत है किन्तु उसका एक अर्थ कर्तव्य भी है। इस प्रकार सारे धर्मशास्त्र धर्मसंहिताएँ हैं, अर्थात कर्तव्य संहिताएँ हैं। इसलिए मनुस्मृति को मनु की संहिता भी कहा गया है। मनुस्मृति के अध्यायों के शीर्षकों को देखने से ही ज्ञात हो जाएगा कि वे राजा को सम्मिलित करते हए समाज के विभिन वर्गों एवं व्यक्तियों के कर्तव्यों का उल्लेख करते हैं। इस प्रकार प्राचीन भारतीय विधिनिर्माताओं ने केवल कर्तव्यों की ही बात सोची और अधिकार के बारे में उन्होंने कदाचित ही कुछ कहा। उन्होंने कर्तव्य पालन को स्वयं के विकास के लिए अनिवार्य बनाकर, कर्तव्य की कठोरता को समाप्त कर दिया। इसीलिए भारतीय धर्म ग्रंथ कहते हैं। जब राजा, प्रजा, पुत्र, पिता, मित्र, सैन्य, सभी अपने कर्तव्यों का उचित प्रकार से पालन करें तो स्वाभाविक है, सभी के अधिकार तो स्वयं ही संरक्षित हो जाएंगे यही है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में मानव अधिकार अवधारणा आज पूरे विश्व के लिए भारत के प्राचीन ग्रंथ मानव अधिकार संरक्षण के सबसे मूल्यवान ग्रंथ हैं। आइए भारत के नेतृत्व में पूरे विश्व को मानव अधिकार प्रदान करें ।
लेखक - एडवोकेट लोकेंद्र शर्मा
