राजिम के निकट गांव चमसुर में पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म हुआ था। उनका जन्म विक्रम संवत 1938 की पौष कृष्ण अमावस्या अर्थात् 1881 ई० को हुआ था। इनके पिता थे पं. जयलाल तिवारी जो कांकेर रियासत में विधि सलाहकार थे, उनकी मां थीं देवमती देवी। इनकी पत्नी नाम श्रीमती बोधनी बाई थी उनके दो पुत्र थे- नीलमणि और विद्याभूषण। पं. जयलाल तिवारी बहुत अच्छे कवि थे और संगीत में उनकी गहरी रुचि थी।
इनकी की परवरिश इसी प्रगतिशील परिवार में हुई। चमसुर गांव के मिडिल स्कूल तक सुन्दरलाल की पढ़ाई हुई थी। इसके बाद उनकी पढ़ाई घर पर ही हुई थी। उनके पिता ने उनकी उच्च शिक्षा की व्यवस्था बहुत ही अच्छे तरीके से घर पर ही कर दी थी। शिक्षक आते थे और सुन्दरलाल शर्मा ने शिक्षकों के सहारे घर पर ही अंग्रेजी, बंगला, उड़िया, मराठी भाषा का अध्ययन किया। उनके घर में बहुत-सी पत्रिकाएँ आती थीं, जैसे- "केसरी" (जिसके सम्पादक थे लोकमान्य तिलक) "मराठा"। पत्रिकाओं के माध्यम से सुन्दरलाल शर्मा की सोचने की क्षमता बढ़ी। किसी भी विचारधारा को वे अच्छी तरह परखने के बाद ही अपनाने लगे। खुद लिखने भी लगे। कविताएँ लिखने लगे। 1898 में उनकी कवितायें रसिक मित्र में प्रकाशित हुई। सुन्दरलाल न केवल कवि ,चित्रकार, मूर्तिकार, नाटक लेखक भी थे। वे कहते थे कि नाटक के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।
देश पराधीन है - यह बात उन्हें बहुत तकलीफ देती थी। इसलिए सन 1906 में वे पहुँचे सूरत जहाँ उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। वहां तिलक उग्र (गरम) दल का नेतृत्व कर रहे थे। गोखले के साथ जो थे वे नरम दल की तरफ से तिलक का विरोध कर रहे थे। सुन्दरलाल शर्मा और उनके साथी पं नारायण राव मेधावाले और डा. शिवराम गुंजे तिलकजी के साथ थे। सुन्दरलाल शर्मा ने सूरत कांग्रेस से लौटकर अपने सहयोगियों के साथ स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें खोलीं। ये दुकानें राजिम, धमतरी और रायपुर में खोली गईं। इन दुकानों के माध्यम से वे स्वदेशी वस्तुओं का प्रचार करने लगे। जो भी खरीदने के लिए आते, उन्हें बताया जाता कि उन्हें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना |
अपनी राह पर सर ऊँचा कर चलने वाले प. सुंदरलाल शर्मा जी ने समाज में चल रहे अस्पृश्यता इसके विरोध में आन्दोलन चलाये। राजिम के राजीव लोचन मन्दिर में कहारों को प्रवेश दिलाने का आन्दोलन सन् 1918 में चलाया। सन् 1925 में राजिम के रामचन्द्र मन्दिर में हरिजनों के साथ प्रवेश किया।
समाज की बुराईयों को शीघ्र समाप्त करने का विचार रखने वाले प. सुंदरलाल शर्मा का यह कहना था कि बचपन से ही किताबें पढ़ने की आदत होनी चाहिय। सन् 1914 में राजिम में उन्होंने एक पुस्तकालय की स्थापना की थी।
महात्मा गाँधी सन 1920 में छतीसगढ़ आये थे। उनको प्रथम बार छतीसगढ़ लाने का श्रेय सुन्दरलाल शर्मा को ही है। उस वक्त कण्डेल गांव में छोटेलाल बाबू के नेतृत्व में नहर सत्याग्रह आरम्भ हुआ था। गाँधी जी के आगमन से ही यह आंदोलन और प्रभावशाली रहा |
सन् 1922 में यह निश्चय किया गया कि जगंल से लकड़ी काटकर कानून का उल्लंधन कर सत्याग्रह आरम्भ किया जाये। इसी सन्दर्भ में पं. सुन्दरलाल शर्मा और नारायण राव मेधावाले सिहावा में गिरफ्तार कर लिये गये। दोनों को एक वर्ष की सजा देकर रायपुर जेल में रखा गया। सन् 1930 में सुन्दरलाल शर्मा को एक वर्ष की कठोर सजा दी गई |
सन् 1933 में जब गाँधीजी हरिजनोद्धार पर निकले थे, तो उन्होंने पं. सुन्दरलाल शर्मा को इस दिशा में अग्रणी बताया था।
इन्होने रायपुर में सतनामी आश्रम, राजिम में ब्रह्मचर्याश्रम और धमतरी में अनाथालय की स्थापना की थी।
साहित्य के क्षेत्र में उनका अवदान लगभग 20 ग्रंथ के रुप में है जिनमें 4 नाटक, 2 उपन्यास और काव्य रचनाएँ हैं। उनकी "छत्तीसगढ़ी दानलीला" इस क्षेत्र में बहुत लोकप्रिय है। कहा जाता है कि यह छत्तीसगढ़ी का प्रथम प्रबंध काव्य है।
पं. सुन्दरलाल शर्मा की योग्य पत्नी बोधनी बाई की सन 1929 में मृत्यु हो गई थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा जी का निधन 28 दिसम्बर 1940 को हो गया। उनके जैसे बहुमुखी प्रतिभा बहुत ही कम हैं।
