प्रेरक प्रसंग :- पेशे का चुनाव Date : 28-May-2024 तिलक जी ने जब वकालत की परीक्षा पास की, तो उनके मित्रों की धारणा थी कि वे या तो सरकारी नौकरी करेंगे अथवा वकालत चालू करेंगे | उन्होंने जब इस सम्बन्ध में चर्चा की तो वे बोले, “मैं पैसे का लोभी नहीं हूँ | पैसे के लिए मैं सरकार का गुलाम बनना पसंद नहीं करता | रही वकालत की बात, तो मुझे यह पेशा भी पसंद नहीं | मैं तो ‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विद्या वह जो मुक्ति देवे)- इस सूक्ति को मानता हूँ ! जो विद्या मनुष्य को असत्याचरण की ओर प्रवृत्त करती है, उसे मै विद्या ही नहीं मानता |” इस पर मित्र चूर रहे, किन्तु कुछ दिनों पश्चात जब उन्हें मालूम हुआ कि तिलकजी 30 रु. मासिक वेतन पर प्राथमिक शाळा के विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं, तो उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ | उनके एक घनिष्ठतम मित्र से न रहा गया और वह बोला ही उठा, “ आखिर तुमने गुरूजी का पेशा ही चुना | तुम भलीभांति जानते हो कि आजकल शिक्षकों की आर्थिक स्थिकी कैसी है ? अरे, तुम जब मरोगे, तो दाह-संस्कार के लिए तुम्हारे घर में लकड़ियाँ तक न मिलेंगी !” तिलक जी ने हंसकर जवाब दिया, ‘’मेरे दाह -संस्कार की चिंता मैं क्यों करूं! हमारी नगरपालिका क्यों बनी हुई है ? मेरी चिता की चिंता उसे होगी | वही सामग्री जुटाएगी और उससे मेरी चिता जलेगी |’’ यह सुनते ही वह मित्र अवाक रह गया और उससे कुछ न कहते बना |