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28 मई 1883 : स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी का जन्म

Date : 28-May-2024

 *पूरा जीवन स्वाभिमान पुनर्जागरण केलिये समर्पित 

 *दोहरा आजीवन कारावास, सर्वाधिक प्रताड़ना ..

भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य वोध जागरण केलिए यूँ तो करोड़ों महापुरुषों के जीवन का बलिदान हुआ है किन्तु उनमें कुछ ऐसे हैं जिनके जीवन की प्रत्येक श्वाँस राष्ट्र के लिये समर्पित रही । स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ऐसे ही महान विभूति थे जिनके जीवन का प्रतिक्षण राष्ट्र और स्वत्व बोध कराने के लिये समर्पित रहा । वे संसार के एक मात्र ऐसे कैदी थे जिन्हें एक ही जीवन में दो आजीवन कारावास का दंड मिला । यह उनके संघर्ष और अंग्रेज सरकार द्वारा दी गई यातनाओं का ही कारण था कि उन्हें समाज ने "स्वातंत्र्यवीर" जैसे  गौरवमयी उपाख्य से सम्मानित किया ।
 
 उन्होंने अंडमान की काला-पानी जेल में कठोरतम यातनाएँ सहीं। उनकी कोठरी 7 X 11 आकार की थी । मौसम गर्मी का हो या सर्दी का उन्हें जमीन पर ही सोना होता था । इसी कोठरी कोने में शौच और पेशाब करना होती । और इसी में भोजन करना होता था । हाथ में हथकड़ी और पैरों में बेड़ियाँ लगी होती थीं। उसी स्थिति में जो और जैसा मिले, वही भोजन करना होता था । उन्हें प्रतिदिन बैल की भाँति कोल्हू में जोता जाता था । यदि तेल निकालने की मात्रा कम हो तो पिटाई होती थी । भोजन नहीं दिया जाता था । उसी जेल में उनके भाई भी थे पर दोनों भाई एक दूसरे से मिलना तो दूर देख भी नहीं सकते थे । पूरी जेल में सावरकर जी एकमात्र ऐसे कैदी थे, जिनके गले में अंग्रेजों ने एक पट्टी लटका रखी थी । इस पर "D" लिखा था । "D" अर्थात डेंजरस। यातनाएँ देने का यह चक्र चला लगभग ग्यारह वर्ष चला । 
इतनी यातनाएँ देने का कारण यह था कि पूना से लेकर लंदन तक उनके जीवन का कोई क्षण ऐसा नहीं बीता जब उन्होंने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति का कोई उपक्रम न किया हो । स्वातंत्र्यवीर सावरकर पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने 1901 में ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर नासिक में आयोजित शोक सभा का विरोध किया था और कहा कि वो हमारे शत्रु देश की रानी थी, हम शोक क्यूँ करें? वीर सावरकर पहले देशभक्त थे जिन्होंने एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह का उत्सव मनाने वालों को त्र्यम्बकेश्वर में बड़े बड़े पोस्टर लगाकर कहा था कि दासता का उत्सव मत मनाओ..! उन्होंने 7 अक्टूबर 1905 को पूना में स्वदेशी अपनाओ आंदोलन छेड़ा और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई थी । 
 
यह सावरकर जी द्वारा स्वाभिमान और स्वतव जागरण केलिए किये जाने वाले कार्यों का ही प्रभाव था कि तिलक जी ने अपने समाचार पत्र "केसरी" में सावरकर जी को छत्रपति शिवाजी महाराज के समान बताकर प्रशंसा की थी ।  सावरकर जी द्वारा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के कारण उन्हे फर्म्युसन कॉलेज पुणे से निकाल दिया गया था । इसके विरोध में छात्रों ने हड़ताल की । इस समूची घटना पर तिलक जी ने ‘केसरी’ पत्र में सावरकर जी के पक्ष में सम्पादकीय लिखा । वे पहले ऐसे बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटेन में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ब्रिटेन के राजा के प्रति वफ़ादार होने की शपथ लेने से इंकार कर दिया था । इस कारण उन्हें बैरिस्टर होने की उपाधि का पत्र कभी नहीं मिला । यह घटना 1909 की है । वीर सावरकर पहले ऐसे लेखक थे जिनकी पुस्तक "1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर प्रकाशन के पहले ही प्रतिबंध लगा । वीर सावरकर पहले क्रान्तिकारी थे जो समुद्री जहाज में बंदी बनाकर ब्रिटेन से भारत लाते समय आठ जुलाई 1910 को समुद्र में कूद पड़े थे और तैरकर फ्रांस पहुँच गए थे । लेकिन तट पर बंदी बना लिये गये । सावरकर जी पहले ऐसे क्रान्तिकारी थे जिनका मुकद्दमा अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में चला । वे भारत के पहले क्राँतिकारी थे जिन्हें अंग्रेजी काल में दो आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई। दो जन्म कारावास की सजा सुनते ही हंसकर बोले, “चलो, ईसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान लिया" । अपने काला पानी कारावास के दौरान उन्होंने कंकर और कोयले से कवितायें लिखीं और 6000 पंक्तियाँ याद रखीं ।
 
ऐसे महान स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र प्राँत के नासिक जिला अंतर्गत ग्राम भागुर में हुआ था। पिता दामोदर पंत सावरकर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के लिये समर्पित ओजस्वी वक्ता थे और माता राधाबाई आध्यात्मिक विचारों और जीवन शैली की प्रबल पक्षधर थीं। इनके दो भाई गणेश दामोदर सावरकर उनसे बड़े थे और नारायण दामोदर सावरकर छोटे । एक बहन नैनाबाई थीं। जब विनायक केवल नौ वर्ष के थे तब महामारी में माता का देहान्त हो गया। और जब सोलह वर्ष के हुये तो पिता भी स्वर्ग सिधार गये । तब बड़े भाई गणेश सावरकर ने परिवार के पालन-पोषण का कार्य सँभाला। दुःख और कठिनाई की इस घड़ी में किशोरवय विनायक की संकल्प शक्ति और दृढ़ हुई । 1901 में नासिक के शिवाजी हाईस्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। बचपन से बहुत कुशाग्र बुद्धि और अति संवेदनशील स्वभाव के थे । पढ़ाई-लिखाई के साथ कविता कहानी और सामायिक विषयों पर आलेख लिखा करते थे । अपने छात्र जीवन में ही उन्होंने स्थानीय युवकों को साथ लेकर मित्र मेलों का आयोजन किया। इसी वर्ष1901 में विवाह हुआ । पत्नि यमुना बाई के पिता रामचन्द्र त्रयम्बक चिपलूणकर आर्थिक रूप से समृद्ध थे । इसलिये उन्होने अपने दामाद की उच्च शिक्षा का भार उठाया। अपने इन धर्म पिता की सहायता से उन्होंने पुणे के फर्ग्युसन कालेज से बी॰ए॰ किया। समय के साथ दो संतान उत्पन्न हुई पुत्र का नाम विश्वास सावरकर और पुत्री का नाम प्रभात सावरकर रखा ।
 
1904 में उन्होंने अभिनव भारत नामक संगठन की स्थापना की। यह संगठन युवकों  अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिकार करता था । अपने छात्र जीवन में भी वे राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत ओजस्वी भाषण दिया करते थे। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक जी उनसे बहुत प्रभावित हुये और उन्हीं के अनुमोदन पर सावरकर जी को श्यामजी कृष्ण वर्मा छात्रवृत्ति मिली। और 1906 में आगे की पढ़ाई के लिये लंदन गये । 
 
सावरकर जी ने लन्दन के ग्रेज इन्न लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया और लंदन स्थित इण्डिया हाउस में रहने लगे । उन दिनों इण्डिया हाउस राजनितिक गतिविधियों का केन्द्र था जिसे श्यामाप्रसाद मुखर्जी चला रहे थे। सावरकर जी ने 'फ़्री इण्डिया सोसायटी' का गठन किया । इसके द्वारा वे भारतीय छात्रों के बीच स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का अभियान चलाने में जुट गये । लंदन में ही उनकी भेंट लाला हरदयाल से हुई वे उन दिनों इण्डिया हाउस की देखरेख करते थे। 1 जुलाई 1909 को मदनलाल ढींगरा द्वारा विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दिये जाने के बाद उन्होंने लन्दन टाइम्स में एक लेख  लिखा था। इसके लिये 13 मई 1910 को उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया । परन्तु 8 जुलाई 1910 को एम॰एस॰ मोरिया नामक जहाज से भारत ले जाते हुए सीवर होल के रास्ते ये भाग निकले । तैरकर फ्रांस के तट पर पहुँचे किन्तु बंदी बना लिये गये । 24 दिसम्बर 1910 को उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी। 31 जनवरी 1911 को इन्हें दोबारा आजीवन कारावास घोषित हुआ । ब्रिटिश शासन काल में दो-दो आजन्म कारावास की सजा सहने वाले सावरकर जी विश्व में अकेले क्रांतिकारी हैं । उन्हे काला पानी भेजा गया वहाँ वे लगभग ग्यारह वर्ष रहे । 
 
 
 
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तब सावरकर जी ने दो ध्वज फहराये । एक भारतीय राष्ट्र ध्वज तिरंगा और दूसरा भारतीय संस्कृति का प्रतीक भगवा ध्वज । उन्होंने स्वतंत्र होने की प्रसन्नता व्यक्त की पर देश विभाजन पर दुःख व्यक्त किया । गाँधी जी हत्या के षड्यंत्र का आक्षेप उन पर भी लगा और 5 फरवरी 1948 गिरफ्तार किया गया। पर अदालत में आरोप सिद्ध न हुआ और वे सम्मान रिहा हुये । 19 अक्टूबर 1949 को उनके अनुज नारायणराव का देहान्त हुआ । 4 अप्रैल 1950 को पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री लियाक़त अली ख़ान के दिल्ली आगमन पर पुनः उन्हें बेलगाम जेल में रोका  गया। मई 1952 में पुणे की एक विशाल सभा में अभिनव भारत संगठन को भंग किया गया। 10 नवम्बर 1957 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम समारोह में वे मुख्य वक्ता रहे। 8 अक्टूबर 1949 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी०लिट० की मानद उपाधि से अलंकृत किया। 8 नवम्बर 1963 को उनकी पत्नी यमुनाबाई का निधन हुआ । सितम्बर, 1965 से उन्हें तेज ज्वर ने आ घेरा, जिसके बाद इनका स्वास्थ्य गिरने लगा। एक फरवरी 1966 को उन्होंने मृत्युपर्यन्त उपवास करने का निर्णय लिया और 26 फरवरी 1966 को बम्बई में प्रातः 10 बजे पार्थिव शरीर त्यागकर परमधाम को प्रस्थान किया । 
 
 
लेखक -रमेश शर्मा

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