आरएसएस से नफरत करनेवालों को जस्टिस चितरंजन दास की बातों को गंभीरता से लेना चाहिए
Date : 15-Jul-2024
समय कभी ठहरता नहीं, वक्त की गति के साथ जो ताल से ताल मिलाकर चलता है, वह इतिहास नहीं बनता, अपने समय में वह सदैव वर्तमान बना रहता है। एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र की चिति का जिक्र अपने भाषणों में कई बार किया था। उनके अनुसार ‘जब लोगों का एक समूह किसी लक्ष्य, आदर्श, मिशन के साथ रहता है और किसी खास भूमि के टुकड़े को मातृभूमि के रूप में देखता है, तो यह समूह एक राष्ट्र का निर्माण करता है। अगर दोनों में से कोई एक - आदर्श और मातृभूमि नहीं है, तो कोई राष्ट्र नहीं है। किसी राष्ट्र का आदर्श या मूल सिद्धांत उसकी आत्मा है। एक व्यक्ति के मामले में, उसकी आत्मा बार-बार जन्म ले सकती है। हर बार एक अलग अस्तित्व होता है, लेकिन आत्मा एक ही होती है। इसी तरह, एक राष्ट्र की एक आत्मा होती है। इसका तकनीकी नाम 'चिति' है। चिति मौलिक है और राष्ट्र के लिए इसकी शुरुआत से ही केंद्रीय है। व्यक्ति राष्ट्र की आत्मा 'चिति' को सामने लाने का भी साधन है। इस प्रकार व्यक्ति अपने स्वयं के अलावा राष्ट्र का भी प्रतिनिधित्व करता है। ’