हिन्‍दू धर्म, उपवास और प्रधानमंत्री मोदी : संदर्भ- पॉडकास्ट संवाद | The Voice TV

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हिन्‍दू धर्म, उपवास और प्रधानमंत्री मोदी : संदर्भ- पॉडकास्ट संवाद

Date : 18-Mar-2025

विश्‍व भर में कहीं भी, किसी भी कौने में हिन्‍दू होकर जीवन जीने के मायने क्‍या हैं, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर से बहुत स्‍पष्‍ट तरीके से व्‍याख्‍यायित कर दिया है। उन्‍होंने दुनिया को समझाया है कि कैसे एक हिन्‍दू अपने जीवन में सर्वसमावेशी है। वास्‍तव में जो आज हिन्‍दू दृष्‍टि पर किसी न किसी रूप में दोष मढ़ने का कार्य कर रहे हैं, उन्‍हें चाहिए कि वे एक बार अवश्‍य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लेक्स फ्रिडमैन के साथ हुए पॉडकास्ट संवाद को सुने। निश्‍चित ही उनके जितने भी भ्रम हिन्‍दू धर्म और इससे जुड़ी परंपराओं को लेकर हैं वह दूर हो जाएंगे। 


वस्‍तुत: प्रधानमंत्री मोदी उच्‍चतम न्‍यायालय का संदर्भ देकर समझाते हैं कि हिंदू धर्म कोई पूजा-पाठ पद्धति का नाम नहीं है, यह तो वे ऑफ लाइफ अर्थात् "जीने का ढंग" या "तरीका" है। जैसे किसी व्यक्ति की जीवनशैली उसकी आदतों और रोज़मर्रा की गतिविधियों का समुच्‍चय है, ठीक वैसे ही भारत में जन्‍मा यह सनातन हिन्‍दू धर्म है। प्रधानमंत्री मोदी यहां कहते हैं कि हिन्‍दू धर्म से जुड़े शास्‍त्र यह कई तरह से समझाते हैं कि कैसे शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा के माध्‍यम से मनुष्यत्‍व को ऊंचाइयों पर ले जाया जा सकता है। इसके लिए हिन्‍दू धर्म कुछ रास्ते और परंपरागत व्यवस्थाओं के माध्‍यम से स्‍वयं को नित्‍य प्रकाशित करते रहने का मार्ग भी बताता है। जिसमें से एक उपवास भी है। 

लेक्स फ्रिडमैन, ने जब प्रधानमंत्री मोदी से उपवास के बारे में जानना चाहा; तब उन्‍होंने सहज रूप से बताया कि आखिर हिन्‍दू धर्म में उपवास के मायने क्‍या हैं। वैसे उपवास को लेकर चरक संहिता में कहा गया है -
'दोषः कदाचित कुप्यन्ति, जिता लंघन पचनेया।
जिता संशोधनहेतुर, न तेषां पुनरुद्धभव।।'

अर्थात, हम केवल अपने शरीर का विषहरण करके अपने सभी दोषों (वात, पित्त और कफ) को संतुलित कर सकते हैं। अगर पाचन क्रिया ठीक रहेगी और हम समय-समय पर उपवास करते रहेंगे, तो हम हमेशा स्वस्थ रहेंगे। वास्‍तव में यह स्‍वस्‍थ रहना शरीर तक सीमित नहीं, यह हमारी इंद्रियों और मन से भी जुड़ा हुआ है, जिसका कि निहितार्थ श्रीमद् भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 59वें श्लोक में स्‍वयं भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को बताया है- 'विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते'। तात्‍पर्य कि निराहार मनुष्य के विषय दूर हो जाते हैं, साधक इंद्रियों को अपने भोग की वस्तुओं से रोक सकता है, लेकिन वस्तुओं के स्वाद की भावना बनी रहती है। हालाँकि, यह स्वाद भी उन लोगों के लिए समाप्त हो जाता है, जिन्हें सर्वोच्च शक्ति का एहसास होता है। इसलिए अपने संवाद में प्रधानमंत्री मोदी उपवास पर व्‍यापक संवाद करते हैं। 

उनके अनुसार उपवास जीवन को अंतर बाह्य दोनों प्रकार के अनुशासन  के लिए बहुत ही उपकारक है। यह जीवन को गढ़ने में भी काम आता है। जब आप उपवास करते हैं, तो आपकी जितनी इंद्रियाँ हैं, खासकर के सुगंध की हो, स्पर्श की हो, स्वाद की हो। ये सभी बहुत जागरुक हो जाती हैं।  दूसरा; उपवास, आपके विचार प्रभाव को ये बहुत ही तीक्ष्णता देते हैं, नयापन देते हैं। प्रधानमंत्री कह रहे हैं, कि यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। उनके लिए उपवास एक उपासना है, जो उन्‍हें बाहर से अंदर की यात्रा और अंदर से होते हुए बाहर, संपूर्ण ब्रह्माण्‍ड की यात्रा कराती है। यह एक अद्भुत अनुभूति है। 

लेक्स फ्रिडमैन ओर अधिक पूछे जाने पर मोदी उन्‍हें हिन्‍दू धर्म की चातुर्मास उपवास व्‍यवस्‍था के बारे में बताते हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे यहाँ चातुर्मास की परंपरा है। जब वर्षा ऋतु होती है। तो हम जानते हैं मनुष्‍य की पाचन शक्ति काफी कम हो जाती है। इसलिए वर्षा ऋतु में एक समय ही भोजन करना है। यानी 24 घंटों में एक समय। मोदी बता रहे हैं कि वो जून मध्‍य से इसका आरंभ करते हैं और फिर दिवाली का करीब-करीब नवंबर माह आ जाता है। लगभग चार से साढ़े चार महीनों तक यह चातुर्मास की परंपरा चलती है। जिसमें वे चौबिस घंटे में एक बार भोजन लेते हैं। फिर नवरात्रि आती है, जो पूरे देश में दुर्गा पूजा का उत्सव है, शक्ति उपासना का उत्सव है, वो नौ दिन का होता है। दूसरा एक मार्च-अप्रैल महीने में नवरात्रि पुन: आती है, जिसे "चैत्र नवरात्रि" कहते हैं। तब फिर से नौ दिन मैं उपवास करता हूँ। फिर वे आगे स्‍पष्‍ट करते हैं कि वास्‍तव में उपवास प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति का अपना निजी मामला है, इसलिए हमारे यहां हिन्‍दू परंपरा में कोई इसकी पब्लिसिटी वगैरह नहीं करता। यह उपवास रखनेवाले एवं इसके महत्‍व को समझनेवाले प्रत्‍येक के जीवन का एक सामान्‍य हिस्‍सा है। 

यहां प्रधानमंत्री मेडिटेशन के माध्‍यम से बहुत सरल ढंग से सनातन हिन्‍दू धर्म की परंपरा में नाद ब्रह्म के महत्‍व को भी प्रतिपादित करते दिखे। वे अपनी हिमालयन लाइफ को याद करते बता देते हैं कि कैसे एक संत ने उन्‍हें एक बर्तन में एक-एक गिरती पानी की बूंद और उसकी टपक-टपक की ध्‍वनि से सिखाया कि तुम कुछ मत करो, सिर्फ इसी की आवाज़ सुनो, कोई और आवाज़ तुमको सुनाई नहीं देनी चाहिए। कितने ही पक्षी बोलते हों, हवा की आवाज आती हो, कुछ नहीं, तुम इस पानी की जो बूंद बर्तन में गिरती हैं, उसे सुनों और अंदर तक अपने रोम-रोम में महसूस करो। यहीं से प्रधानमंत्री मोदी की ध्‍यान यात्रा आरंभ हो जाती है। कोई मंत्र नहीं, सिर्फ टप-टप की ध्‍वनि और इस तरह से उस नाद-ब्रह्म से मोदी अपना नाता जोड़ने में सफल हो जाते हैं। 

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी यहां अपनी बातचीत में कुछ मंत्रों का जिक्र भी करते हैं और हिन्‍दू धर्म को जीनेवाले प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के जीवन में उसे पूर्णता का अनुभव करा देते हैं।  उन्‍होंने कहा- ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। यानी पूरे जीवन को एक सर्कल के अंदर उस (ब्रह्म) ने रखा हुआ है। पूर्णता ही सर्वस्‍व है, पूर्णता प्राप्त करने का विषय है। उसी प्रकार से हमारे यहां (हिन्‍दू परंपरा में) कल्याण की बात कही गई है, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। यानी सबका भला हो, सबका सुख हो, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःख भाग भवेत्। अत: इन सभी मंत्रों में भी लोगों के सुख की बात है, लोगों के आरोग्‍य का बात है और फिर करें क्या ? ॐ शांतिः, शांतिः, शांतिः। 

हमारे हर मंत्र के बाद आएगा, “Peace, Peace, Peace” यानी ये जो धार्मिक संस्कार (Rituals) भारत में डेवलप हुए हैं, वो हज़ारों सालों की ऋषियों की साधना से निकले हुए हैं। लेकिन वे जीवन तत्व से जुड़े हुए हैं। वैज्ञानिक तरीके से रखे हुए हैं। वास्‍वत में यही भारत है, जिसके बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सभी को बहुत सहजता से व्‍यापक अर्थों में समझाने का प्रयास किया है। 
 
 
लेखक -डॉ. मयंक चतुर्वेदी 
(लेखक, पत्रकार एवं राष्‍ट्रीय फिल्‍म प्रमाणन बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के सदस्‍य हैं)

 


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