11 मई 1915 क्राँतिकारी बसंत कुमार बिस्वास का बलिदान Date : 11-May-2024 दिल्ली में वायसराय हार्डिग पर बम फेका था क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास अपना भविष्य, अपने केरियर, पढ़ाई और जीवन का मोह छोड़कर किशोरवय से ही अंग्रेजों से भारत की मुक्ति महायज्ञ से जुड़े और केवल बीस वर्ष की आयु में ही बलिदान हो गये । राष्ट्र का निर्माण तानों या नारों से नहीं होता, लहू और लोहे से होता है । लोहे सा मजबूत संकल्प हो जो प्राणों की बाजी लगा देने में कोई संकोच न हो । तब राष्ट्र का स्वाभिमान गर्वोन्नत होता है । क्राँतिकारी बसंत कुमार विश्वास ऐसे ही मजबूत इरादों के साथ भारत राष्ट्र की स्वाधीनता संघर्ष में आये । परिवार की पृष्ठभूमि पीढ़ियों से राष्ट्र के लिये बलिदान की रही है । इनके पूर्वज दिगम्बर विश्वास ने इतिहास प्रसिद्ध नील विद्रोह का नेतृत्व किया था । इनका जन्म 6 फरवरी 1895 को बंगाल के नदिया जिले के पोड़ागाछा नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता मतिलाल बिश्वास भी क्राँतिकारी थे। जब पढ़ने केलिये विद्यालय पहुँचे तो शिक्षक भी क्राँतिकारी रोदचन्द्र गांगुली मिले । वे भी क्राँतिकारी संगठन युगान्तर से जुड़े थे । परिवार की पृष्ठभूमि और शिक्षक के मार्गदर्शन से बसंत कुमार विश्वास भी किशोर चौदह वर्ष की आयु से ही "युगान्तर" से जुड़ गये । आरंभ में उन्हें संदेश वाहक का काम मिला । इसी बीच उनका परिचय क्राँतिकारियों के मार्ग दर्शक अमरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय से हुआ और उनके माध्यम से रासबिहारी बोस के संपर्क में आये । तब उनकी आयु मात्र सोलह वर्ष थी । यहाँ उन्हें छद्म नाम "बिशे दास" मिला और क्राँतिकारियों की टोली के साथ लाहौर भेज दिया गया । अब उनका केन्द्र लाहौर था । क्राँतिकारी रास बिहारी बोस ने एक केन्द्र देहरादून भी बनाया । बसंत बिस्वास का लाहौर से दिल्ली और देहरादून आना जान बढ़ा । उन्हीं दिनों वायसराय हाॅर्डिंग की पदस्थापना भारत हुई । वायसराय हाॅर्डिग दिखावे केलिये तो बहुत उदारवादी अभिनय करता था लेकिन उसकी तमाम योजनाएँ भारत के भीतर भारत को समाप्त करने की होतीं थीं। अपने मीठे व्यवहार से उसने कुछ भारतीयों को फुसलाकर शिक्षा और संस्कृति के मिशनरी करण करने का अभियान तेज किया । अंग्रेजों ने यह अभियान 1757 के प्लासी युद्ध के बाद ही आरंभ किया गया था लेकिन वायसराय हार्डिग के समय यह बहुत तेज हुआ । इसी के चलते युगान्तर ने वायसराय हाॅर्डिंग को बम से उड़ाने की योजना बनाई और तेरह क्राँतिकारियों को यह काम सौंपा । योजना के नायक क्रांतिकारी रास बिहारी थे । सभी क्राँतिकारी अपने अपने काम में लगे और वायसराय हार्डिग को दिल्ली में समाप्त करने का निर्णय हुआ । वह 23 दिसंबर 1912 का दिन निश्चित हुआ। इतिहास के पन्नों में यह "दिल्ली षड्यंत्र केस" के नाम से दर्ज है । वायसराय होर्डिंग हाथी पर बैठकर शाही अंदाज में बड़े जुलूस के साथ दिल्ली में प्रवेश कर रहा था । वायसराय के स्वागत के लिये पूरी दिल्ली को सजाया गया था । क्राँतिकारियों ने भी वायसराय का स्वागत अपने तरीके से कर रखी थी । क्राँतिकारियों ने अपने तरीके से स्वागत करने के लिये चाँदनी चौक का क्षेत्र चुना । क्राँतिकारी बसंत कुमार विश्वास साड़ी पहनकर महिलाओं के बीच चाँदनी चौक की एक छत पर पहुँच गये । बम उन्होंने साड़ी में छिपा रखा था । इस छत पर सारी महिलाएँ ही थीं। इसलिये छिपने में असुविधा नहीं हुई । वायसराय का काफिला चांदनी चौक पहुँचा और जैसे ही उस मकान के सामने आया बसंत कुमार विश्वास ने बम फेक दिया । बम हाथी को लगा पर वायसराय बच गया। जुलूस में भगदड़ मच गई । बसंत बिस्वास साड़ी फेककर सामान्य हो गये । सभी क्राँतिकारी सुरक्षित निकल गये । बसंत कुमार बिस्वास क्राँतिकारी रासबिहारी बोस के साथ देहरादून आ गये और कम्पाउन्डर की नौकरी करने लगे । लेकिन पुलिस को इस काँड में रास बिहारी बोस का हाथ होने की सूचना मिल गई थी और उनके साथ जुड़े क्राँतिकारियों के नाम भी पता चल गये थे । क्राँतिकारियों को भी पुलिस की सक्रियता की जानकारी लग गई थी । सभी ने लाहौर और देहरादून खाली कर दिया । क्राँतिकारी रास बिहारी बोस जापान निकल गये और अपना नाम एवं बदलकर बसंत कुमार विश्वास कलकत्ता पहुँच गये जहाँ नाम बदलकर कम्पाउन्डर की नौकरी करने लगे और क्राँति की अन्य गतिविधियों में संलग्न हो गये । तभी उनके पिता का निधन हो गया । क्राँतिकारी बसंत कुमार बिस्वास अपने पिता के अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिये अपने गाँव परकाछा पहुँचे। यद्यपि उनका वेष बदला हुआ था । लेकिन पुलिस ने पहचान लिया गया । पुलिस ने उन्हें 26 फरवरी 1914 को गिरफ्तार कर लिया । गिरफ्तार करके कलकत्ता लाया गया । इनकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने देश भर में एक साथ छापे मारे । पुलिस को कलकत्ता के राजा बाजार स्थित क्राँतिकारियों के गुप्त केन्द्र का भी पता चल गया था । वहाँ भी छापा पड़ा। इस तलाशी पुलिस को महत्वपूर्ण दस्तावेज हाथ लगे और वायसराय हार्डिग केश में शामिल सभी क्राँतिकारियों के नाम भी ।दिल्ली षड्यंत्र केस में मास्टर अमीर चंद, अवध बिहारी और भाई बालमुकुंद सहित सहित कुल तेरह क्राँतिकारी बंदी बना लिये गये । पुलिस की प्रताड़ना से एक क्राँतिकारी दीनानाथ सरकारी गवाह बन गये । 23 मई 1914 से मुकदमें की सुनवाई शुरु हुई । जिला अदालत ने तीन लोगों को फाँसी और बसंत कुमार विश्वास को आजीवन कारावास की सजा दी । क्राँतिकारी बसंत कुमार बिस्वास को उनकी आयु कम होने के कारण फाँसी के बजाय आजीवन कारावास दिया गया था । इसकी अपील लाहौर हाईकोर्ट में की गई। अंततः बसन्त बिस्वास को भी फाँसी की सजा सुनाई गई । तीन क्राँतिकारियों भाई बालमुकुन्द, अमीरचंद, और अवध बिहारी को आठ मई और बसंत कुमार विश्वास को तीन दिन बाद 11 मई 1915 को लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। इतिहास के पन्नों में भले क्राँतिकारी बसंत कुमार बिस्वास का उल्लेख कम हो पर जापान के टोक्यो नगर के एक पार्क में क्राँतिकारी बसंत कुमार बिस्वास की मूर्ति लगी है । इसकी स्थापना रासबिहारी बोस ने की थी । भारत में उनकी प्रतिमा नादिया जिले कृष्णानगर में लगी है । लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने भारतीय संसद के संग्रहालय में बसंत कुमार की एक तस्वीर स्थापित की । लेखक - -रमेश शर्मा