पश्चिम एशिया में भारतीय संस्कृति का विस्तार
Date : 21-May-2024
'किताबबुल अदुलि बुलमुरफ़रद' के लेखक ' इमाम बुखारी ' ने ऐसे कई प्रमाण दिए हैं जिसमें ईसा की सातवीं शताब्दी में ईराक और अरब में जाटों की बहुत बड़ी संख्या मौजूद थी।
इस्लाम का 'एकेश्वरवाद का सिद्धांत' व्यास के 'वेदांत सिद्धांत' के प्रकाश में विकसित हुआ माना जाता है। 'सूफी संप्रदाय' पर 'वेदांत' की गहरी छाप है। अरबी में वेद्पा की बुद्धिमानी का बार-बार उल्लेख आता है। विश्लेषण कर्ताओं ने ' वेदपा ' का तात्पर्य ' वेदव्यास ' को मना है और उन्हीं के महाभारत आदि पुराणों में वर्णित कथानको एवं सिद्धांतों को " वेद्पा फिल हिकमत " अर्थात " वेदव्यास की बुद्धिमानी " कहकर इंगित किया गया है।
अरबी में संस्कृत शब्दों की, उसके अपभ्रंशों की भरमार है । इस भाषा प्रभाव को देखने से प्रतीत होता है कि किसी समय इस क्षेत्र में संस्कृत का प्रचलन रहा होगा और स्थानीय भाषा के मिश्रण से अरबी का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ होगा। अरब के प्राचीन साहित्य में ऐसे अरबी अनुवादों की भरमार है। जो भारत के ग्रंथो से अनूदित किए गए हैं। इन पुस्तकों में ज्ञान और विज्ञान के प्रत्येक पक्ष वाले भारतीय ग्रंथो का अनुवाद करके वहां के भाषा भंडार की श्रीसमृद्धि की गई है।
जिस प्रकार चीनी यात्री समय-समय पर भारत में धर्म शिक्षा तथा ज्ञान संपदा संपादित करने के लिए आते रहे हैं। इसी प्रकार अरब शिक्षार्थी भी भारत आये थे। ' अलबरूनी ' भारत में 40 वर्ष रहा। यहां उसने संस्कृत पढी तथा संस्कृत का अध्ययन किया। उसने अपने अनुभवों को" किताबुल हिंद" तथा " कानून मस ऊदी " में उल्लेख किया है।
बसरा निवासी दार्शनिक ' जाहिज ' ने अपनी पुस्तक " गोरी और काली जातियों का तुलनात्मक अध्ययन " में भारतीय ज्ञान- विज्ञान और रहन-सहन की भूरी- भूरी प्रशंसा की है। अरब इतिहासकार ' याकूबी ' ने भारत के हर क्षेत्र में बड़े-चढ़े ज्ञान गरिमा को मुक्त कंठ से सराहा है।
अरबो ने अंकगणित भारत से सीखा इसलिए अंकों को ' हिंदसा ' कहा जाता है। भारतीय गृह गणित संबंधी ग्रंथो का अनुवाद भी अरबी में हुआ है। ' बृहस्पति सिद्धांत ' का ' अस्सिद हिंद ', आर्यभट्ट का, आजवन्द , खंडक खाधक का ' अरकंद ' नाम से अनुवाद हुआ है। खलीफा मंसूर के समय में भारतीय ज्योतिषी की वहां के राज दरबार में नियुक्ति होती थी।
खलीफा मवपिफ़क बिल्लाह अब्बासी ने एक दल भारत में चिकित्सा विज्ञान एवं जड़ी- बूटी उत्पादन की शिक्षा लेने के लिए भेजा था। ' इब्न दहन ' नाम के अरब विद्वान ने संस्कृत से अरबी में अनेकों आयुर्वेद ग्रंथो का अनुवाद करके उस देश के निवासियों को लाभान्वित किया। प्रधानमंत्री 'खालिया बरामकी' ने ' सुश्रुत ' का अनुवाद कराया और उसे ' ससरो ' नाम दिया। इस प्रकार 'चरक संहिता' का भी अनुवाद हुआ । आयुर्वेद वेत्ता शानक, रूसा,राय लिखित ग्रंथ भी अरबी जनता के लिए उसी काल में उपलब्ध किए गए। अरब प्रधानमंत्री यहिया बरमकी ने फिर एक दल भारत भेजा जो यहां धर्म तथा चिकित्सा संबंधी जानकारियां संग्रह करके वहां के लोगों के लिए उपलब्ध करें। ऐसे ही शोधकर्ताओं में येरूसलम का एक विद्वान लेखक ' मुतहमूर ' भी था ,जिसने अपनी पुस्तक " किताबुल विदअवत्तारीख " में तत्कालीन भारत की धार्मिक स्थिति का विस्तार पूर्वक वर्णन लिखा । उसने इस देश के उपासको के 'जल भक्तिय' अर्थात अभिषेक, तर्पण , अर्ध्य, तीर्थ -स्नान आदि के प्रमुखता वाले 'अग्नि होतरिय ' अर्थात अग्निहोत्री- यज्ञ धर्म को दो भागों में विभक्त किया है। उन दिनों यहां ऐसे ही कर्मकांड का प्रधानतया प्रचलन था। ' अबूजैद सैराफी' ने भारत की स्थिति का जैसा उल्लेख किया है उससे प्रतीत होता है कि वह भी स्थिति को आंखों से देखने आया होगा।
अरबी का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है बीजासफ इसमें भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन है। साथ ही बौद्ध सत्व के जन्म, चरित्र, शिक्षा, मृत्यु आदि का वर्णन है। उसे इस्लाम धर्मनिर्वाइयों का एक वर्ग अभी भी धर्म ग्रंथ के रूप में मानता है। इसके कुछ अध्याय प्रसिद्ध अरबी धर्म ग्रंथ ' इखवानुस खफा' में सम्मिलित किए गए हैं। पुस्तक का नाम ' वीजासफा ' वस्तुत: ' वोधीसत्व ' का ही अपभ्रंश है । पुरानी फारसी में 'घ' के स्थान पर 'ज' उच्चारण होता रहा है। बोधी का बीज हो जाना इस दृष्टि से सामान्य बात है।
अरबी भाषा में अनेकों संस्कृत के महत्वपूर्ण ग्रंथो का अनुवाद हुआ है। 'महाभारत' की कथाओं का अनुवाद 'अबू सलाह बिन सोएब' ने किया इसका ईरानी संस्करण " उल्था मुजम्मिल उत्तावारीख " नाम से पेरिस पुस्तकालय में सुरक्षित है। ' इब्न नदीम ' की ' किताबुल फेहरिस्त ' में उल्लेख मिलता है कि शानाक और वाकर नमक भारतीय विद्वानों ने कितने ही संस्कृत के राजनीति तथा तंत्र ग्रंथो का अनुवाद अरबी भाषा में किया। अरबी का ' कलेला दमना ' ग्रंथ ' पंचतंत्र ' का अनुवाद है। जिसे 9वीं शताब्दी में ' अब्दुल्लाह विमुकफ्फा ' ने संपन्न किया था। उसी का पद्दानुवाद महाकवि 'अब्बान' ने किया था और राज्य पुरस्कार पाया था।
चीन के एशिया में चीनी यात्री प्रहुहंसान्ग के अनुसार सन 630 में वर्तमान अफगानिस्तान का गांधार प्रदेश भारतीय क्षत्रिय राजाओं के शासन का अंग था । अभी भी काबुल में 22 हिंदू मंदिर हैं। बैरागी ,उदासी ,नाथ और संन्यासी संप्रदाय वाले साधुओं के मठ वहां अभी भी मौजूद हैं । वहां की पश्तो भाषा में संस्कृत शब्दों का बाहुल्य है । इस देश को महा व्याकरणी पाणिनी की जन्मभूमि माना जाता है। धृतराष्ट्र की पत्नी 'गांधारी' गांधार प्रदेश की ही राजकुमारी थी।
काबुल नदी के तट पर बसा ' काबुल ' नगर अफगानिस्तान की अति प्राचीन राजधानी है । उसका पुराना नाम ' आर्याण ' है। 'आर्याण' अर्थात "आर्य लोगों का निवास क्षेत्र"। यहां आर्य, बौद्ध और यवन संस्कृतियों के महत्वपूर्ण भग्नावशेष सुरक्षित हैं। काबुल की पुरानी बस्ती पुराने ढंग की बसी है किंतु नई काबुल रूस और अमेरिका की तरह विशालकाय गगनचुंबी और साफ सुथरी बनी हुई है। स्त्रियां बहुमूल्य कालीनों के निर्माण में लगी हुई मोहल्ले मोहल्ले में देखी जा सकती हैं।
नादिरशाह का मजार और करगाह झील दर्शकों के आकर्षण का केंद्र है। कहते हैं कि नादिरशाह भारत को लौटकर वापस जा रहा था तो यही रास्ते में उसका अंत हो गया था। शहर से 25 किलोमीटर दूर करगाह झील बहुत ही सुंदर है। लोग उसमें नौका विहार करते हैं । तटवर्ती छोटे-छोटे होटलों में बिछी बैंजो पर बैठकर इस झील का मनोहर दृश्य अच्छी तरह देखा जा सकता है। कॉलेज में हिंदी तथा संस्कृत भाषा के अध्ययन का प्रबंध है। उच्च वर्ग की स्त्रियां पूरी मेहनती हैं। स्कूली लड़किया ही फ्रराक पहने दिखतीं हैं। वयस्क स्त्रियों को पर्दे में रहना पड़ता है। हां गरीब घरो की स्त्रियां मेहनत मजदूरी के सिल-सिले में मुंह खोले हुए काम करती दिखाई देती हैं। भाषा पश्तो है पर उस पर संस्कृत का गहरा प्रभाव है । अच्छी उर्दू जानने वाला यहां के लोगों की बातचीत सुनकर उसका मोटा अर्थ तो समझ ही सकता है।
इस्लाम के उद्भव और विस्तार की जन्मभूमि अरब है। अरब देश में इस्लाम के अवतरण से पूर्व बौद्ध/ हिन्दु धर्म प्रचलित था। इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं। हदीसो के अनुसार हजरत आदम जब धरती पर आए तो उन्होंने पहले चरण पृथ्वी के स्वर्ग भारत में रखा और दूसरा चरण अरब में । लंका उन दिनों भारत का ही अंग था। लंका में 'आदम पीक' नामक स्थान अभी भी हजरत के अवतरण का स्थल माना जाता है और मुसलमान वहां भक्ति पूर्वक नमन करने जाते हैं।
अरब देश में एक प्रतिभाशाली वंश * *बरामका ' की महत्वपूर्ण हलचलों का वर्णन वहां के इतिहास में मिलता है। इस वंश के लोगों को तब शासन में मंत्री पद तक प्राप्त था। यह वंश अग्निहोत्री था उन्होंने बलख में ' नौ बिहार ' एवं ' अग्नि मंदिर ' बनवाया था। सन 651 में मुसलमानी आक्रमण में यह मंदिर गिराया गया और उसके अनुयायियों को पकड़कर दश्मिक ले जाया गया, जहां वे मुसलमान बन गए। क्रमशः