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भोजशाला विवादः हाई कोर्ट में एएसआई की भूमिका पर उठे सवाल, इंटरवीनर पक्ष का दावा- सर्वे रिपोर्ट संदेहास्पद

Date : 28-Apr-2026

 इंदौर, 27 अप्रैल । मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में नियमित सुनवाई सोमवार को जारी रही। इस दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की भूमिका पर सवाल उठाए गए। एएसआई ने 1998 में पेश जवाब में कहा था कि भोजशाला मंदिर है या मस्जिद इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता और अब वही एएसआई भोजशाला को मंदिर बता रहा है।

मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में मंगलवार को भोजशाला मामले में हस्तक्षेपकर्ता काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क रखे। लगभग दो घंटे चली सुनवाई के दौरान उन्होंने शोभा मेनन ने सरकार और एएसआई की रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे संदेहास्पद बताया।

वरिष्ठ अभिभाषक मेनन ने इस मामले में याचिका दायर करने वाले हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी की ओर से पेश की गई दोनों याचिकाओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस को लेकर कहा कि ये ट्रस्ट 2021 में अस्तित्व में आया और वर्ष 2022 में उसने भोजशाला को लेकर जनहित याचिका दायर कर दी। इसी तरह याचिकाकर्ता तिवारी ने याचिका में खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताया है लेकिन उन्होंने क्या समाजसेवा की है, उसके बारे में कोई जानकारी कोर्ट में नहीं रखी।

मेनन ने अदालत में कहा कि यह मामला जनहित याचिका नहीं, बल्कि टाइटल सूट (स्वामित्व विवाद) का है, जिसकी सुनवाई सिविल कोर्ट में ही होनी चाहिए। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने आर्टिकल 226 के तहत जनहित याचिका दायर की है, जबकि यह स्पष्ट रूप से दीवानी का मामला है। ऐसे में उच्च न्यायालय को इस पर भारी कॉस्ट लगानी चाहिए।

मेनन ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी वास्तविक पेशे की जानकारी छिपाकर खुद को समाजसेवी बताया। पहले इसी तरह की याचिका (1997) सिविल सूट दायर करने की स्वतंत्रता के साथ वापस ली गई थी। इसके बावजूद आज तक सिविल कोर्ट में कोई वाद दायर नहीं किया गया। वर्तमान याचिका विलंब से दायर की गई है और नियमों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने दोनों याचिकाओं को निरस्त करने की मांग की।

सरकार के रुख में विरोधाभास

सुनवाई के दौरान मेनन ने एएसआई और सरकार के अलग-अलग समय पर दिए गए बयानों में विरोधाभास को बताया। उन्होंने कहा कि पहले विवादित स्थल को न मंदिर, न मस्जिद बताया गया। अब एएसआई इसे केवल मंदिर बता रही है। इससे सरकार की भूमिका संदेहास्पद प्रतीत होती है और याचिकाकर्ताओं को समर्थन मिलने का संकेत मिलता है।

एएसआई की ओर से एडवोकेट सुनील जैन ने कोर्ट को बताया कि भोजशाला सर्वे की वीडियो फुटेज सील्ड हार्ड ड्राइव में हाईकोर्ट में पेश कर दी गई है। साथ ही यह जानकारी भी दी गई कि सर्वे की वीडियो ईआरपी सिस्टम पर अपलोड कर दी गई है, जिससे प्रतिवादी कमाल मौला मस्जिद वेलफेयर सोसायटी को देखने की सुविधा दी गई है।

मामले में इंटरवीनर पक्ष की ओर से शोभा मेनन अपनी दलीलें आगे भी रखेंगी। अगली सुनवाई 28 अप्रैल को है। दरअसल, भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट में चार जनहित याचिकाएं और एक अपील पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनवाई चल रही है। धार निवासी काजी जकुल्ला ने भोजशाला मामले में चल रही दो जनहित याचिकाओं में हस्तक्षेपकर्ता के तौर पर याचिका दायर की है। साथ ही उन्होंने भोजशाला मामले में ही आए वर्ष 2003 के फैसले को चुनौती देते हुए अपील भी प्रस्तुत की है।


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