शहडोल और उमरिया जिले के बॉर्डर पर स्थित है बूढी माता मंदिर ,इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है तथा इसके चमत्कार की कहानियाँ दूर-दूर तक फैली है | ऐसी मान्यता है कि कभी पांडव भी इस मंदिर में पूजा अर्चना किया करते थे ,इस लिए जो भी भक्त इस मंदिर में माँ के सामने मन्नत लेकर आते है वह अवश्य पूर्ण होती है |
बूढी माता मंदिर 6वीं शताब्दी की है तथा नवरात्री के समय या नवरात्री के बाद भी यहाँ भक्तो की भीड़ लगी रहती है| माता के दरबार से सभी भक्त खुश होकर वापस अपने घर लोटते है |
मान्यता के अनुसार इस मंदिर का नाम बूढी माता पड़ने का एक बड़ा कारण है कहा जाता है की पहले इस स्थान में कभी घंगोर जंगल हुआ करता था | एक दिन एक दुखी व्यक्ति को माता ने बूढी माता के रूप में दर्शन दिए थे जिसके बाद से माता के चमत्कार को देखने के बाद इस मंदिर का नाम बूढी माता नाम हो गया तथा यहाँ सदियों से माता को बूढी माता के नाम से जाना जाता है |लोग दूर दूर से माता का दर्शन करने व पूजा अर्चना के लिए आते है |
इस मंदिर में एक बहुत पुराना कुआ भी है जो कभी नहीं सूखता है इस कुए के पाने को लोग माता को चढ़ाते है और प्रसाद की रूप में ग्रहण करते है | कहते है कि इस कुए का पानी पीने व नहाने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है |
बूढी माता मंदिर का पुरातात्विक इतिहास को बताते है कि बूढी माता मंदिर का बहुत ही एतिहासिक और पुरातातिव्क महत्व है , यह 9 वीं सदी के बाद यहाँ पर जब कलचुरियों का शासनकाल आया तो कलचुरी राजाओ ने ही इस बूढी माता मंदिर की स्थापना की थी | यह मंदिर 10 वीं 11 वीं सदी पुराना पुरातात्विक स्थल है|
