चाणक्य नीति:- शिक्षा सुपात्र की | The Voice TV

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चाणक्य नीति:- शिक्षा सुपात्र की

Date : 11-Oct-2023

 मूर्खशिषयोपदेशेन  दुष्टास्त्रीभरनेन |

दु:खितै: सम्प्रयोगेन  पंडितो·प्यवसीदति || 

मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से , उपदेश देने से , दुष्ट स्त्री का भरण-पोषण करने से तथा दुःखी लोगों का साथ करने से विद्वान व्यक्ति भी दुःखी होता है यानी कह सकते हैं कि चाहे कोई भी कितना ही समझदार क्यों हो किन्तु मूर्ख शिष्य को पढ़ाने पर, दुष्ट स्त्री के साथ जीवन बिताने पर तथा दुःखियों -रोगियों के बीच रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दु:खी हो ही जाता है | साधारण आदमी की तो बात क्या | अतः नीति यही कहती है कि मूर्ख शिष्य को शिक्षा नहीं देनी चाहिए | दुष्ट स्त्री से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए बल्कि उससे दूर ही रहना चाहिए और दुःखी व्यक्तियों के बीच नहीं रहना चाहिए |

हो सकता है, ये बातें किसी भी व्यक्ति को साधारण या सामान्य लग सकती है लेकिन यदि इन पर गंभीरता से विचार किया जाये तो यह स्पष्ट है कि शिक्षा या सीख उसी व्यक्ति को देनी चाहिए जो उसका सुपात्र हो या जिससे मन में इन शिक्षा प्रद बातों को ग्रहण करने की इच्छा हो |

आप जानते हैं कि एक बात वर्षा से भीगते बन्दर को बया ( चिड़िया ) ने घोंसला बनाने की शिक्षा दी लेकिन बंदर उसकी इस सीख के योग्य नहीं था | झुंझलाए हुए बन्दर ने बया  का ही घोसला उजाड़ डाला | इसीलिए कहा गया है कि जिस व्यक्ति को किसी बात का ज्ञान हो उसे कोई भी बात आसानी से समझाई जा सकती है पर जो अधूरा ज्ञानी है उसे तो ब्रम्हा भी नहीं समझा सकता | इसी सन्दर्भ में चाणक्य ने आगे कहा है कि मूर्ख के समान ही दुष्ट स्त्री का संग करना या उसका पालनपोषण करना भी व्यक्ति के लिए दुःख का कारण बन सकता है | क्योंकी जो स्त्री अपने पति के प्रति आस्थावान हो सकी वह किसी दूसरे के लिए क्या विश्वसनीय हो सकती हैं ? नहीं ! इसी तरह दुखी व्यक्ति जो आत्मबल से हीन हो चूका है, निराशा में डूब चुका है उसे कौंन उबार सकता है | इसलिए बुद्धिमान को चाहिए कि वह मूर्ख, दुष्ट स्त्री या दुःखी व्यक्ति ( तीनों से ) बचकर आचरण करे | पंचतंत्र में भी कहा गया है-

माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी |

अरण्यं तेन गन्तव्यं  यथारन्यं तथा गृहम ||'

अर्थात् जिसके घर में माता हो और स्त्री व्यभिचारिणी हो, उसे वन में चले जाना चाहिए, क्योंकि  उसके लिए घर और  वन दोनों समान ही है |

दुःखी का पालन भी सन्तापकारक ही होता है | वैध परदु:खेन तप्यतेदूसरे के दुःख से दुःखी होता है | अतः दुःखियों के साथ व्यवहार करने से पंडित भी दुःखी होगा |  

 


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