जानीयात्प्रेषणेभृत्यान बान्धवानव्यसना··गमे |
मित्रं या··पत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ||
आचार्य चाणक्य समय आने पर संबंधियों की परीक्षा के सन्दर्भ में कहते हैं – किसी महत्वपूर्ण कार्य पर भेजते समय सेवक की पहचान होती है | दुःख के समय में बन्धु-बन्धवों की, विपत्ति के समय मित्र की तथा धन नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है |
यदि किसी विशेष अवसर पर सेवक को कहीं किसी विशेष कार्य से भेजा जाए तभी उसकी ईमानदारी आदि की परीक्षा होती है | रोग या विपत्ति में ही सगे –संबंधियों तथा मित्रों की पहचान होती है और गरीबी में, धनाभाव में पत्नी की परीक्षा होती है |
सभी जानते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है | वह अकेला नहीं रह सकता | उसे अपने हर काम को करने में सहायक, मित्र, बन्धु, सखा और परिजनों की आवश्यकता होती है किन्तु किसी भी कारणवश उसके ये सहायक उसकी जीवन – यात्रा में समय पर सहायक नहीं होते तो उस व्यक्ति का जीवन निष्फल हो जाता है | अतः सही सेवक वही जो असमय आने पर सहायक होवे | मित्र, सखा व बन्धु वही भला जो आपत्ति के समय सहायक हो, व्यसनों से मुक्ति दिलानेवाला हो और पत्नी वही सहायिक और असली जीवन –संगिनी है जो धनाभाव में भी पति का सदैव साथ दे | ऐसा न होने पर इनका होना बेकार है |
