शिष्य से गुरु बने तक का सफ़र -रामदास जी | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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शिष्य से गुरु बने तक का सफ़र -रामदास जी

Date : 30-Oct-2023

जीवन की हर स्थिति में सहजता सैद्धांतिक संकल्पों की दृढ़ता का बने रहना श्रेष्ठ अंतर अवस्था का सुफल होता है। यह अवस्था परमात्मा की भक्ति, आस्था और समर्पण से प्राप्त होती है। 'चौथे नानक' गुरू राम दास जी महाराज ने एक पवित्र शहर रामसर का निर्माण किया जो कि अब अमृतसर के नाम से जाना जाता है। गुरु रामदास जी का स्वयं का जीवन इस दार्शनिक अवधारणा का मूर्त रूप था और मानवता को भी उन्होंने इसी मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। गुरु रामदास जी को गुरु” की उपधि मिलना का भी एक रोचक किस्सा है |

निरगुण कथा, कथा है हरि की॥

भजु मिलि साधू संगति जन की।

तरु भउजलु अकथ सुनहरि की॥

गोविंद सतसंगति मेंलाई।

हरि रसु रसना राम गुन गाइ॥

सिख गुरु अमरदास जी की उम्र लगभग 105 वर्ष हो गयी थी, तब उनके कुछ शिष्य सोचा करते थे, ʹमैंने गुरु जी की बहुत सेवा की है, इसलिए यदि गुरुगद्दी मुझे सौंप दी जाय तो कितना अच्छा होगा !ʹ

एक दिन गुरु अमरदास जी ने शिष्यों को बुलाकर कहाः तुम लोग अलग-अलग अच्छे चबूतरे बनाओ !

चबूतरे बन गये पर उनमें से गुरु जी को एक भी पसंद नहीं आया। उन्होंने फिर से बनाने को कहा। ऐसा कई बार हुआ। शिष्य चबूतरे बनाते और गुरुजी उन्हें तोड़ने को कहते।

आखिर शिष्य निराश हो गये और सेवा छोड़कर जाने लगे किन्तु शिष्य रामदास अभी भी चबूतरा बनाने में जुटा हुआ था। उन लोगों ने उनसे  कहाः पागल का आज्ञा मानकर तुम भी पागल क्यों बन रहे हो ? चलो छोड़ दो चबूतरा बनाना।

रामदास ने कहाः अगर गुरु पागल हैं तो किसी का भी दिमाग दुरुस्त नहीं रह सकता। हमें तो यही सीख मिली है कि गुरु ईश्वर का ही दूसरा रूप हैं और उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। अगर गुरुदेव सारी जिंदगी चबूतरा बनाने का आदेश दें तो रामदास जिंदगी भर चबूतरा बनाता रहेगा।

इस प्रकार रामदास जी  ने लगभग सत्तर चबूतरे बनाये और  गुरु अमरदास जी ने उन सबको तुड़वाकर फिर से बनाने का आदेश दिया। आखिर गुरु ने उनकी  लगन और गुरु भक्ति देख उसे ह्रदय से लगा कर कहाः तुम  ही सच्चा शिष्य है और तुम ही गुरुगद्दी का अधिकारी होने के योग्य हो ।

इतिहास साक्षी है कि गुरु अमरदास जी के बाद गुरुगद्दी सँभालने वाले गुरु रामदास जी  ही थे।


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