सही मायने में फड़के जी ही पहले भारतीय थे जिन्होंने स्वराज का सपना देखा था, स्वराज के लिए आह्वान किया था और अपने सिमित साधनो के बाबजूद पूरी ताकत के साथ प्रयास भी किये थे। फड़के का दृढ़ विश्वास था कि स्वराज ही भारत के हर संकट का यही समाधान है , फिर चाहे वह किसानो कि समस्या हो या गरीबी या फिर स्व-रोजगार का विषय ।
1857 कि क्रांति कि विफलता के बाद , ज्यादातर क्रांति के नायक फांसी पर चढ़ा दिए गये थे या गुमनामी के अँधेरे जीने को बाध्य थे। लोगो का होंसला पूरी तरह टूट चूका था और लोग यह मान चुके थे कि अंग्रेज़ो को हराना असंभव है। उन्ही दिनों भारत माँ के यह दुलारे समाज के कमजोर लोगो को इकठ्ठा कर क्रांति की तैयारी कर रहा थे ।
फड़के जी पर महादेव गोविन्द रानाडे इस बात का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा कि अंग्रेज देश पर राज ही नहीं कर रहे बल्कि देश के अमूल्य संसाधनों और दौलत को धीरे-धीरे अपने देश भेज रहे हैं। वे गांव-गांव घूमकर लोगों में इस लूट के विरोध में प्रचार करते रहे। पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया।
वासुदेव बलवंत फड़के ने समाज के हाशिए खड़ी भील, डांगर, कोली, रामोशी आदि जातियों के युवाओं को मिलाकर एक गुप्त सेना खड़ी कर दी।
होंसलो का धनी यह व्यक्ति एक अलग ही मिटटी से बना था , यह जानते हुए भी कि कुछ व्यक्तियों के बल पर अंग्रेज़ो को हराना संभव नहीं है, यह अपने उद्देश्यों के लिए हर क़ुरबानी देने को तैयार था। अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए लोगों को जागृत करने का कार्य उन्होंने किया। महाराष्ट्र की कोळी, भील तथा धांगड जातियों को एकत्र कर उन्होने 'रामोशी' नाम का क्रान्तिकारी संगठन खड़ा किया। इसमें न तो उन्हें देशी नरेशों से कोई सहायता मिली , न उन्हें संभ्रांत वर्ग का कोई सहयोग मिला फिर भी उन्होंने फ़रवरी 1879 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। उन्होंने अपनी छोटी सी सेना से अंग्रेज़ो को कई गंभीर घाव दिये, कई जगह उनकी सम्पति लूटी और गरीबो में बाँट दी।
उनकी बढ़ती ताकत से भयभीत होकर अंग्रेज़ो ने उनकी गिरफ़्तारी पर उस समय पचास हज़ार का इनाम रखा था। इनाम का लालच में किसी ने फड़के की सूचना पुलिस को पहुंचा दी। उन्हें 20 जुलाई 1879 को ,गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाकर अदन की जेल में भेज दिया गया। जेल में वासुदेव ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। 17 फरवरी 1883 को इसी भूख हड़ताल के चलते वासुदेव बलवंत फड़के ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। महाराष्ट्र का ये नौजवान 37 साल की उम्र में ही तमाम क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बन गया।
1882 में जब वो जेल में थे, तब आनंद मठ का पहला एडीशन छपकर आया था। दरअसल आनंदमठ संन्यासियों के अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन पर आधारित थी, लेकिन बंकिम चंद्र चटर्जी ने उस वक्त के अंग्रेजी राज के खिलाफ जेल में बंद फड़के से जुड़ी कहानियों और कार्यशैली को अपनी इस किताब में शामिल कर लिया और एक दिन वंदेमातरम क्रांतिकारियों का प्रेरक गान बन गया और आनंदमठ प्रेरणा श्रोत।
लेखक -सुनिल शर्मा
