सनातम धर्म में गाय को विशेष महत्व दिया गया है | गाय की सेवा करने से विशेष लाभ प्राप्त होते है | देखा जाए तो गाय की सेवा हर रोज करनी चाहिये किन्तु गौ पूजन के लिए कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को विशेष महत्व रखती है | इसे गोपाष्मी के नाम से जाना जाता है | इस दिन गाय की विधि विधान से पूजा और सेवा करने से मनुष्य को पुण्य की प्राप्ति होती है |
पौराणिक कथा के अनुसार जब एक बार श्री कृष्ण माँ यशोदा से कहते है ‘माँ मै बछड़े चरा सकता हूँ! कृष्ण जी की यह बात सुनकर माँ यशोदा ने इस विषय में कृष्ण जी को नंद बाबा से पूछने को कहती है |
तब भगवान श्री कृष्ण नंद बाबा के पास जाकर कहने लगते है , बाबा अब मैं बछड़ा नहीं गाय चराउंगा | तब नंद बाबा कहते है कि लाला तुम अभी छोटे हो तुम बछड़े ही चराओं .. नंद बाबा की यह बात सुन कर श्री कृष्ण जिद्द करने लगे , तब नंद बाबा ने पंडित जी को बुलवाते है शुभ मुहूर्त के लिए |
पंडित जी ने पंचांग देखकर गणना करने लगे , तब नंद बाबा ने ने पूछा क्या बात है पंडित जी आप बार-बार क्या गिन रहे है ? पंडित जी कहते है नंद बाबा जी आज का ही मुहूर्त निकल रहा है | इसके बाद एक वर्ष तक कोई मुहूर्त नहीं है ... पंडित जी की बातें सुनकर नंद बाबा ने कृष्ण जी को गौ चराने की अनुमति दे देते है | एक वर्ष का समय न देखते हुए कार्तिक मास की शुल्क पक्ष अष्टमी के दिन से गौ चराना प्रारंभ किया गया |
कार्तिक मास के शुल्क पक्ष की तिथि को भगवान श्री कृष्ण और बलराम की गौ- चराने की लीला शुरू हुई | हिन्दू मान्यता की अनुसार गोपाष्मी का बहुत महत्त्व है इस दिन गाय का श्रृंगार किया जाता है और उनकी पसंद का भोजन हरे घास खिलानी चाहिए इसे शुभ मन जाता है |
गोपाष्मी के दिन भगवान कृष्ण का ध्यान कर गाय की परिक्रमा करने करनी चाहिए और गाय की चरणों की धुल को अपने माथे पर लगाना चाहिए | इस दिन ग्वालों को तिलक लगाकर उनको दान दक्षिणा देना शुभ मन जाता है |
