जब भी हम स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों याद करते है जिन्होंने भारत की भूमि को स्वधीनता दिलाने के लिए कई रास्तें तैयार किया जिसके फलस्वरूप भारत एक उभरते गणराज्य की आधारशिला बनीं |उन महानायकों में एक नाम है डॉ. राजेंद्र प्रसाद जिन्होंने न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम को स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि उन्होंने भारत गणराज्य के पहले राष्ट्रपति के रूप में देश का सर्वोच्च पद भी संभाला। आज हम उनकी 139वी जयंती पर उनके देश सेवा .त्याग देशभक्ति उनके आदर्शो के बारे जानेगे |
राजेंद्र प्रसाद का व्यक्तित्व अत्यंत सरल एवं गंभीर प्रवृति के थे | बात उन दिनों की है जब महान् स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद देश के प्रशिद्ध वकीलों के रूप में जाने जाते थे। उनके पास मान-सम्मान एवं अन्य किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं थी।1917 में उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया |चंपारण सत्याग्रह के दौरान किसानों की दुर्दशा देख राजेंद्र बाबू को बहुत आघात हुआ , जो भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनके प्रवेश का प्रतीक रहा । राजेन्द्र बाबू ने वकालत छोड़ दी और अपना पूरा समय मातृभूमि की सेवा में लग गए । हालांकि अपने एक पुराने मित्र रायबहादुर हरिहर प्रसाद सिंह को दिए वचन के कारण उनके मुकदमों की पैरवी के लिए उन्हें इंग्लैण्ड जाना पड़ा।
सीनियर बैरिस्टर अपजौन इंग्लैण्ड में हरि जी का केस लड़ रहे थे, जिनके साथ राजेन्द्र बाबू को काम करना था। अपजौन देखते कि राजेन्द्र बाबू सुबह से शाम तक अपना कार्य बिना कुछ बोले, पूरी निष्ठा और लगन के साथ करते रहते हैं। वह उनकी सादगी और विनम्रता से बेहद प्रभावित हुए। एक दिन किसी ने अपजौन को राजेंद्र बाबू के बारे में बताया कि वह एक सफल वकील रहे हैं पर अपने देश को स्वधीनता दिलाने के लिए उन्होंने वकालत छोड़ दी और अब गांधीजी के निकटतम सहयोगी हैं।
अपजौन को आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगे कि ये इतने दिनों से मेरे साथ काम कर रहे है पर अपने मुख से आज तक अपने बारे में कुछ नहीं बताया। अपजौन एक दिन राजेन्द्र बाबू से बोले- लोग सफलता, पद और पैसे के पीछे भागते हैं और आप हैं कि इतनी अच्छी चलती हुई वकालत को छोड़ दिया । आपने गलत किया। राजेन्द्र बाबू ने जवाब दिया- एक सच्चे भारतीय को अपने देश को स्वाधीनता कराने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए। वकालत छोड़ना तो एक छोटी सी बात है। अपजौन आवक रह गए। ऐसे व्यक्तित्व के धनी थे हम सबके डॉ. राजेन्द्र प्रसाद |
