चाणक्य नीति:-पराधीनता | The Voice TV

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"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

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चाणक्य नीति:-पराधीनता

Date : 06-Dec-2023

कष्टं खलु मूर्खत्वं कष्ट खलु यौवनम |

कष्टात्कष्टतरं चैव परगे हनिवासनम ||

आचार्य का कहना है कि मूर्खता कष्ट है, यौवन भी कष्ट है, किन्तु दूसरों के घर में रहना कष्टों का भी कष्ट है |

वस्तुतः मूर्खता अपनेआपमें एक कष्ट है और जवानी भी व्यक्ति को दुःखी करती है | इच्छाएँ पूरी होने पर  भी दुःख तथा कोई भलाबुरा काम हो जाये, तो  भी दुःख | इन दुःखों से बड़ा दुःख हैपराये घर में रहने का दुःख | पर-घर में तो व्यक्ति स्वाभिमान के साथ रह सकता है और अपनी इच्छा से कोई काम कर सकता है | क्योंकि मूर्ख व्यक्ति को उचितअनुचित का ज्ञान होने के कारण हमेशा कष्ट उठाना पड़ता है | इसीलिए कहा गया है कि मूर्ख होना अपने-आपमें एक बड़ा अभिशाप है | कौन-सी बात उचित है और कौन-सी अनुचित है, यह जानना जीवन के लिए आवश्यक होता है | इसी भांति जवानी बुराईयों की जड़ है | कहा तो यहां तक गया है कि जवानी अन्धी और दीवानी होती है| जवानी में व्यक्ति काम के आवेग में विवेक खों बैठता है, उसे अपनी शक्ति पर गुमान हो जाता है | उसमें इतना अहं भर जाता है कि वह अपने सामने किसी दूसरे व्यक्ति को कुछ समझता ही नहीं | जवानी मनुष्य को विवेकहीन ही नहीं, निर्लज्ज भी बना देती है, जिसके कारण व्यक्ति को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं | ऐसे में व्यक्ति को यदि दूसरे के घर में रहना पड़े तो उसे दूसरे की कृपा पर उसके घर की व्यवस्था का अनुसरण करते हुए रहना पड़ेगा | इस तरह  वह अपनी स्वतंत्रता गंवा देगा| तभी तो कहा गया- ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’| इसीलिए इन पर विचार करना चाहिए|

 

 

 

 

 


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