छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर नगर चौराहे पर जय स्तंभ चौक है जो आज भी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए असंख्य शहीदों की कृति की कहानी की स्मृति है | 10 दिसंबर 1897 में वीर नारायण सिंह को फांसी की सजा हुई थी और साथ ही उन्हें बीच चौराहे पर तोप से उड़ा दिया गया | जयस्तंभ चौक में वीर नारायण से स्मरण के लिए उनका प्रतिमा बनाई गई है |
वीर नरायण सिंह का जन्म 1795 में सोनाखान के जमीदार रामसहाय के घर में हुआ था | रामसहाय जिसमे वीरता देश भक्त और बिझवार आदिवासी समुदाय के थे | वे अंग्रजो और भोंसले राजाओं के विरुद्ध तलवार उठाई लेकिन कैप्टन मैक्सन ने विद्रोह को दबा दिया था | 1830 ईस्वी में पिता के मृत्यु के बाद वीर नारायण सिंह जमीदार की बागडोर सभाले |
1856 में छत्तीसगढ़ में भयानक सूखा पड़ा था, अकाल और अंग्रेजों द्वारा लागू किए कानून के कारण प्रांत वासी भुखमरी का शिकार हो रहे थे। तब वीर नायायण सिंह ने अपने गोदाम में गरीबों को अनाज बाट दिए इससे भी भोजन की पूर्ति नहीं हो पा रही थी तथा कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था। वीर नारायण ने उससे अनाज गरीबों में बांटने का आग्रह किया लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने माखन के गोदाम के ताले तुड़वा दिए और अनाज निकाल ग्रामीणों में बंटवा दिया।
उनके इस कदम से नाराज ब्रिटिश शासन ने उन्हें 24 अक्टूबर 1856 में संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर जेल में बंद कर दिया। वे 10 महीने 4 दिन तक जेल में बंद रहे। इस घटना से सोनाखाना की जनता में अंग्रजो के लिए बगावत की भावना प्रबल हो उठी थी.
उधर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हो जाने के कारण जगह-जगह पर अंग्रेजो से लड़ाइयां होने लगी थी. वीर नारायण सिंह रायपुर की जेल में बंदी होने के कारण बैचन थे. परंतु वे इस मौके पर कुछ कर दिखाने के लिए बेचैन थे. उन्होंने अपने ऊपर तैनात तीसरी रेजिमेंट के पहरेदार ओं को अपनी ओर मिला लिया. और वे जेल से भाग गए, शेर पिंजरे से भाग चुका था. और अंग्रेज सरकार हाथ मलती रह गई जेल से भागकर वीर नारायण सिंह अपने गांव सोनाखाना पहुंचे और अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की तैयारियां प्रारंभ कर दी.
सर्वप्रथम उन्होंने अपने गांव में आने जाने वाले रास्तों पर अवरोधक खड़े कर दिए. और वहां शस्त्र पहरेदार नियुक्त कर दिए उन्होंने आदिवासियों की शस्त्रों से सुसज्जित एवं एक विशाल सेना तैयार कर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने हेतु तैयार किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने आसपास के जमींदारों को भी साथ देने के लिए निमंत्रण पत्र भेज दिए. रायपुर के डिप्टी कमिश्नर मिस्टर इलियट ने लेफ्टिनेंट स्मिथ को आदेश दिया. कि वह नारायण सिंह पर आक्रमण करके उसे बंदी बना ले. स्मिथ ने एक विशाल सेना के साथ सोनाखाना की ओर प्रस्थान किया. कुछ गद्दार जमीदार भी अपनी सेनाएं लेकर स्मिथ के साथ हो गए. लेफ्टिनेंट स्मिथ ने अपनी सेना के साथ 10 नंबर 1857 इसी को रायपुर के लिए प्रस्थान किया.
नारायण सिंह के एक गुप्तचर ने अंग्रेज स्मिथ की सेना को भटका दिया था. जिससे वह गलत स्थान पर जा पहुंच गया. अगले दिन स्मिथ को मालूम हुआ कि नारायण सिंह ने अपने गांव के रास्ते में एक ऊंची दीवार बनाकर मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है. और वह अंग्रेजों से संघर्ष हेतु पूर्ण रूप से तैयार है. स्मिथ ने करौदी गांव में अपना पड़ाव डाल कर अपनी शक्ति में वृद्धि करके अचानक आक्रमण करने का निश्चय किया. उसने कटंगी, बड़गांव एवं बिलाईगढ़ के जमीदारों को सेना सहित से अपने सहायता के लिए बुलाया. उसने नारायण सिंह के गांव सोनाखाना की ओर जाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए. ताकि वहां के लोगों को रसद एवं अन्य सामग्री प्राप्त न हो सके.
अंग्रेजी सेना लेफ्टिनेंट स्मिथ ने बिलासपुर से भी सहायता सेना की प्रार्थना की. परंतु उसे वहां से कोई सहायता प्राप्त नहीं हो सकी. इस पर रायपुर के डिप्टी कमिश्नर ने उसके पास अतिरिक्त सेना भेज दी. इसमें कटंगी, बड़गांव तथा बिलाईगढ़ के जमीदार भी अपनी सेनाओं को लेकर स्मिथ की सहायता के लिए पहुंच गए. लेफ्टिनेंट स्मिथ ने सेना के साथ निमतल्ला से देवरी के लिए प्रस्थान किया. और अपने सहायकों को नाकाबंदी करने का आदेश दिया. नारायण सिंह के एक दूसरे गुप्तचर ने स्मिथ को मार्ग से भटका कर गलत स्थान पर पहुंचा दिया. बड़ी मुश्किल से वह 30 नवंबर को देवरी पहुंचा. सोनाखाना से देवरी की दूरी 10 मील थी, देवरी का जमीदार रिश्ते में नारायण सिंह का काका था.
वीर नारायण सिंह जी का बलिदान
अगले दिन अंग्रेजी सेना लेफ्टिनेंट स्मिथ सोनाखाना गांव पहुंचा. जो खाली हो चुका था उसने पूरे गांव में आग लगवा दी रात को पहाड़ से स्मिथ की सेना पर गोलियों की बौछार शुरू हो गई. विवश होकर जान बचाने के लिए स्मिथ को पीछे हटना पड़ा. प्रथम युद्ध में नारायण सिंह ने स्मिथ को सेना सहित पीछे हटने के लिए विवश कर दिया. अब स्मिथ ने और सेना एकत्रित करके पूरे पहाड़ को चारों ओर से घेर लिया. पहाड़ पर रसद सामग्री नहीं पहुंच सकती थी. देवरी का जमीदार स्मिथ को सारी गुप्त सूचनाएं दे रहा था. नारायण सिंह ने निरपराध लोगों की बलि देने के स्थान पर सोनाखाना के लोगो के लिए प्राण देकर अपने साथियों की प्राण रक्षा करने का निश्चय किया.
5 दिसंबर अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी को नारायण सिंह ने रायपुर पहुंच कर वहां के डिप्टी कमिश्नर मिस्टर इलियट के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. उस देश भक्तों के लिए अंग्रेजों के पास एक ही पुरस्कार था. और वह था फांसी का फंदा. वीर नारायण सिंह 10 दिसंबर 18 सो 57 को रायपुर के चौराहे पर खुले आम लोगों के सामने फांसी पर लटका दिया गया. रायपुर के उस चौराहे पर खड़ा हुआ जय स्तम्भ आज भी उस के बलिदान, वीरता, देशभक्ति की गाथा को ताजा कर देता है
