जो प्रतिपल विकसित होता है- वही ब्रह्म, वही शब्द | The Voice TV

Quote :

"जिन्दगी के लक्ष्य में प्राप्ती करते समय सिर्फ 2 सोच रखनी चाहिए, अगर रास्ता मिल गया तो ठीक, नहीं तो रास्ता में खुद बना लूँगा।"

Editor's Choice

जो प्रतिपल विकसित होता है- वही ब्रह्म, वही शब्द

Date : 09-Dec-2023

शब्द आत्म अभिव्यक्ति के उपकरण होते हैं। वे मन की बात कहने के माध्यम हैं। प्रत्येक शब्द का गर्भ होता है। इस गर्भ में शब्द का अर्थ छिपा होता है। शब्द अपने स्थान के अनुसार भी अर्थ बदलते रहते हैं। शब्द मुस्कराते हैं। कभी-कभी वे संकोची भी जान पड़ते हैं और कभी-कभी अपने अर्थ के प्रभाव में सबको आच्छादित भी करते हैं। शब्दों की अपनी महिमा है। प्रकृति सृष्टि का अपना संसार है। प्रकृति की अभिव्यक्ति सांसारिक रूपों में होती है। समृद्ध भाषाओं में प्रकृति की प्रत्येक अभिव्यक्ति के लिए अलग अलग शब्द हैं। कहना कठिन है कि शब्द के भीतर सारा संसार समाया हुआ है या संसार के भीतर सारे शब्द समाए हुए हैं। शब्द संसार के सभी रूपों के प्रतिनिधि हैं। शब्द हंसते हुए दुख और विषाद को कम भी करते हैं। हर्ष और विषाद भी शब्दों के माध्यम से प्रकट होते हैं। शब्द ज्ञानकोष के आज्ञाकारी जान पड़ते हैं। दुनिया का सारा ज्ञान विज्ञान शब्दों में प्रकट हुआ है। इस तरह हमारे सामने दो संसार प्रकट होते हैं। एक संसार रूपों का और दूसरा संसार शब्दों का। कदाचित इसीलिए व्यास जी ने शब्द को ब्रह्म कहा। संस्कृत में ब्रह्म का अर्थ है सतत् विस्तरमानता। जो प्रतिपल विकसित हो रहा है सतत विस्तारशील है वही ब्रह्म है। वही शब्द है।

भारतीय संस्कृति का प्रचार व प्रसार संस्कृत की प्रचुर भाषा सम्पदा में हुआ। शब्द सरस्वती तट पर स्तुतिरूपा था। शब्द मंत्र था। शब्द मुद मोद प्रमोद का वाहक बना। चतुर्दिक शब्द। सामने शब्द, पीछे शब्द, दांए शब्द, बांए शब्द। शब्द आकाश का गुण है। शब्द आकाश में था। मंत्र रूप में परम व्योम में था। संप्रति शब्द सार्म्थय घटी है। चर्चित राजनेता भी शब्द और अपशब्द का भेद नहीं करते। कुछ शील अश्लील में भी फर्क नहीं करते। समाज का वातावरण बिगड़ता है। सुन्दर शब्दों की तुलना में असुंदर शब्द प्रभावी होते जाते हैं। बुरा शब्द अच्छे शब्द को धकियाता है। अच्छा शब्द रिरियाते हुए धक्का खाकर पीछे चला जाता है। इंग्लैंड के अर्थशास्त्री ग्रेशम ने कहा था कि, 'खोटे सिक्के अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं।'

अस्तित्व की तरह शब्द संसार भी लगातार विस्तीर्ण हो रहा है। पहले शब्दों की संख्या कम थी। धीरे-धीरे बढ़ती गई। अब विभिन्न भाषाओं में लाखों शब्द हैं। शब्द की जन्म तिथि का पता लगाना कठिन है। आदिम मनुष्य के पास भाषा नहीं थी और न ही समझ में आने वाली बोली। उस समय मनुष्य ने स्वयं को प्रकट करने की इच्छा की। अनुमान है कि संकेतों से मनुष्य ने अपने मित्रों के बीच अपना भाव प्रकट किया होगा। उंगली से संकेत करना, हाथों को हृदय पर रखना, मन की बात रखने के लिए कंधे उचकाना आधुनिक काल में बॉडी लैंग्वेज कहा जाता है। तो भी हाव भाव के माध्यम से पूरा अर्थ प्रकट करना कठिन था। तब मनुष्य का ध्यान प्रकृति के अंतर्संगीत की तरफ गया होगा। कुछ ध्वनिमूलक संकेतों से बात आगे बढ़ी होगी। चार्ल्स डारविन ने ऐसे तथ्यों की ओर संकेत किया है। ध्वनियों के संयोजन से संगीत का जन्म हुआ होगा और शब्दों के संयोजन से गीतों का जन्म। दुनिया के सारे गीत शब्दों से बनते हैं और संगीत ध्वनि संयोजन से। इसीलिए संगीत का अर्थ नहीं होता और गीत का अर्थ होता है।

जहां-जहां अर्थ वहां-वहां शब्द। जहां-जहां शब्द वहां-वहां अर्थ। अथर्ववेद के एक सुन्दर मन्त्र में सरिताओं से कहा गया है, 'हे सरिताओं आप नाद करते हुए बहती हैं इसलिए आप का नाम नदी पड़ा है।' पहले जल प्रवाह फिर जल प्रवाह की ध्वनि और उसका नाद फिर जल तरंग की अनुभूति और फिर नदी। मनुष्य की तरह नदियां भी प्रसन्न या उदास होती हैं। मनुष्य नदियों को प्रसन्न बहते हुए देखते हैं। शब्द भी प्रसन्न होते हैं। शब्द प्रसन्नता के इस प्रवाह से काव्य का जन्म होता है। यहां भी शब्द की महत्ता है। दुनिया का सारा ज्ञान विज्ञान और दर्शन शब्द के माध्यम से सार्वजानिक सम्पदा बना है। शब्द वस्तुतः वाणी के अंश होते हैं। वाणी वाक् है। शब्दों के अर्थपूर्ण संयोजन से वाक्य बनते हैं। वाक्य शक्ति हैं और वाणी उसका प्रकट रूप। कुछ शब्द स्वयं पूर्ण होते हैं। शब्द ब्रह्म हैं और उपनिषदों में ब्रह्म रस बताया गया है। रसो वै सह। कुछ शब्द नीरस भी होते हैं लेकिन अपने मूल स्वभाव से नीरस नहीं होते। उन्हें रसपूर्ण या नीरस बनाना शब्द प्रयोगकर्ता पर निर्भर है। सामान्यतः अर्थ और नाम ज्ञान के मौलिक आधार हैं। सभी रूप प्रकृति की अभिव्यक्ति हैं। उनका नामकरण मनुष्य का कौशल है। ऋग्वेद के ज्ञानसूक्त में कहा गया है कि, 'पहले रूपों के नाम रखे गए। विद्वानों ने सार असार को अलग किया।'

सभी नाम शब्द हैं लेकिन सभी शब्द नाम नहीं हैं। शतपथ ब्राह्मण के रचनाकार ने वाणी को विराट कहा था। शब्द की देह अक्षर है। अक्षर अविनाशी है। इसलिए शब्द भी अमर हैं लेकिन शब्द भी मनुष्य की तरह बूढ़े होते हैं। शब्द भाषा की काया होते हैं। शब्द जीवन का प्रवाह हैं। प्रेम शब्दों में प्रकट होता है। अस्तित्व का रस भी शब्दों के माध्यम से मिलता है। जीवन की मधुमयता भी शब्दों में प्रकट होती है। मधु आपूरित शब्द जीवन को मधुमय बनाते हैं। नीरस व अप्रिय शब्द जीवन को आहत करते हैं। अथर्ववेद में मधुर शब्दों की इच्छा व्यक्त की गई है। ऋषि की प्रार्थना है कि, 'हमारी जिव्हा का अग्रभाग मधुर हो। मध्य भाग मधुर हो। वाणी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें।' शब्द वस्तु या पदार्थ नहीं होते। वे अपना अर्थ ढोते हुए ध्वनि तरंगों से प्रकट होते हैं। अच्छा है कि शब्द पदार्थ नहीं होते वरना बड़ी कठिनाई होती। हम अपने मित्रों के साथ प्रायः 16-20 घंटे गप मारते हैं। शब्द प्रयोग करते रहते हैं। शब्द अगर पदार्थ होते तो उन्हें सुरक्षित रखने की जगह नहीं होती। शब्द पदार्थों का वर्गीकरण भी कठिन होता। सरस शब्द, नीरस शब्द, शालीन शब्द, क्रुद्ध और आक्रामक शब्द। मृदु और तिक्त शब्द आदि तमाम तरह के शब्द अलग रखने पड़ते और अपशब्द अलग। कभी कभी शब्दों अपशब्दों में लड़ाई होती। तब शब्द जीतता या अपशब्द कहना कठिन होता।

गाली भी शब्दों से बनती है। संभवतः हिंसक उपायों से बचने के लिए कुछ समझदार विद्वानों ने शब्द को गाली बनाया था। शब्द बोलना आसान है। शब्द से गाली बनाना कठिन है। गाली के रचनाकारों के सामने चुनौतीपूर्ण स्थिति रही होगी। शब्द संयोजन में क्या जोड़ें? क्या घटाएं कि शब्द गाली बने। गालियां प्रायः सम्बंधित व्यक्ति के लिए नहीं होती। वे उसकी माता या बहन के विरुद्ध होती हैं। सम्बंधित व्यक्ति अपनी माता व बहन की आत्मीयता में कुपित होते हैं। लेकिन भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में विवाह आदि मांगलिक कार्यक्रमों में महिलाएं वर पक्ष को गलियां देती हैं। ये गलियां उत्तेजित नहीं करती। वातावरण को सरस करती हैं। दोनों पक्ष शब्दरस, शब्द मोद व शब्दलीला का आनंद लेते हैं। गाली वाले शब्द आनंद आपूरित करते हैं। शब्द आनंददाता हैं। ज्ञानवाहक हैं। दर्शन के साधक हैं। सामाजिक एकता का माध्यम हैं। भाषाविद मोलिनीविसी ने 1923 में कहा था, 'भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।' जर्मन भाषाविद सामरलेट ने यही बात दोहराई। शब्द संयम अपरिहार्य है।

 हृदयनारायण दीक्षित

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement