रवीन्द्रनाथ टैगोर-पुण्यतिथि | The Voice TV

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रवीन्द्रनाथ टैगोर-पुण्यतिथि

Date : 07-Aug-2024

 

रवीन्द्रनाथ टैगोर

विश्वकवि कहे जाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि , साहित्यकार , दार्शनिक , कहानीकार, संगीतकार, चित्रकार और नाटककार  व साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता हैं | रवीन्द्रनाथ टैगोर एक महान साहित्यकार थे | रवीन्द्रनाथ टैगोर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | उनका जन्म बंगाल में 7 मई 1861 को हुआ था |

साहित्य के जगत में टैगोर ने बहुत प्रसिद्धि पाई हैं | मात्र आठ वर्ष की उम्र मे पहली कविता और केवल 16 वर्ष की उम्र मे पहली लघुकथा प्रकाशित कर बांग्ला साहित्य मे एक नए युग की शुरुआत की रूपरेखा तैयार की। इन्होंने प्रासंगिक आधुनिकतावाद के साथ बंगाली साहित्य और संगीत के साथ-साथ भारतीय कला को भी नया रूप दिया | उन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह और दहेज प्रथा को भी उजागर किया।16 अक्टूबर 1905 को बंगाल विभाजन हुआ और इसने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बंगाली लोगों को एकजुट करने के लिए बांग्लार माटी बांग्लार जोल (बंगाल की मिट्टी, बंगाल का पानी) गीत लिखा था|

रवींद्रनाथ टैगोर उस समय लिख रहे थे जब पूरा देश स्वतंत्रता संग्राम की आग में जल रहा था और वे पूरी लगन के साथ इस संघर्ष में कूद पड़े। रवींद्रनाथ टैगोर ने 'गीतांजलि नामक काव्यसंग्रह की रचना की | जिसके अंग्रेजी अनुवाद ने पूरी दुनिया में प्रसिद्धि प्राप्त की, इनके द्वारा लिखी गई ज्यादातर कविताएं स्वतंत्रता आंदोलन और देशभक्ति जैसे विषयों पर आधारित होती थी

साहित्यकार होने के साथ – साथ  रवींद्रनाथ टैगोर एक अच्छे संगीतकार भी थी | रविंद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।उन्होंने अपने पूरे जीवन काल में करीब दो हजार गीतों की रचनी की है | रवींद्रनाथ टैगोर एकमात्र ऐसे ज्ञानी व्यक्ति हैं जिन्होंने 3 अलग-अलग देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा है। उन्होंने जहां भारत के लिए राष्ट्रगान 'जन गण मन' लिखा, वहीं बांग्लादेश के लिए राष्ट्रगान 'अमर सोनार बांग्ला' और श्रीलंका के लिए बंगाली में 'नमा नमा श्रीलंका माता' लिखा। उन्होंने व्यावहारिक गतिविधियों के आधार पर शांति निकेतन नामक एक शैक्षिक सेटअप भी बनाया। उन्हें काव्‍य संग्रह गीतांजलि के 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। टैगोर की प्रतिभा से अंग्रेज़ अभिभूत थे। प्रथम विश्व युद्ध से पहले उनकी कई कृतियों का अनुवाद किया गया था। युद्ध समाप्त होने के बाद, टैगोर को राजघराने द्वारा नाइटहुड की उपाधि प्रदान की गई।

जब रवीन्द्रनाथ ने गाँधी जी को महात्मा की उपाधि दी तो गाँधी ने उन्हें  श्रद्धांजलि देते हुए गुरुदेव की उपाधि दी | तब से रवीन्द्रनाथ टैगोर , गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर बन गये | गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ टैगोर , गुरुदेव वह केवल कहने मात्र के लिए नहीं थे, बल्कि उनके विचार, उनका ज्ञान एक गुरु की तरह की लोगों को मार्गदर्शन आज भी कर रहा है |

 

समाज में योगदान :-

उन्होंने महिलाओं की एजेंसी, उनकी शिक्षा के अधिकार और उनकी स्वायत्तता की मान्यता का समर्थन किया, एक ऐसे समाज की कल्पना की जहां महिलाओं की आवाज़ और आकांक्षाओं का सम्मान किया गया और उन्हें उचित सम्मान दिया गया। इसके अलावा, समाज और संस्कृति पर टैगोर के विचार प्रकृति पर उनके विचारों के साथ गहराई से जुड़े हुए थे।

टैगोर पारंपरिक कक्षा शिक्षा के खिलाफ थे। उनका मानना ​​था कि सीखने के लिए प्रकृति के साथ बातचीत ज़रूरी है। 29 दिसंबर, 1918 को टैगोर ने विश्व भारती विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी उन्होंने शिक्षा को एक समग्र विकास प्रक्रिया के रूप में पुनर्निर्मित किया, जहां शिक्षक छात्रों को भावनात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्थान की ओर मार्गदर्शन करने वाले मार्गदर्शक की तरह होंगे। काव्यरचना गीतांजलि के लिए उन्हें 1913 में इन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला जो कि एशिया मे प्रथम विजेता साहित्य मे है। 

1941 में दुनिया को कहा अलविदा

इसमें कोई शक नहीं है कि उन्होंने बंगाली साहित्य के आयाम को बदल कर रख दिया। कई देशों ने महान लेखक को श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी प्रतिमाएं भी बनाई हैं। लगभग पांच संग्रहालय टैगोर को समर्पित हैं, जिनमें से तीन भारत में और शेष दो बांग्लादेश में स्थित हैं।

 

उनका आखिरी समय काफी तकलीफ में बीता और 1937 में वे कोमा में चले गए। लंबी पीड़ा और दर्द के बाद 7 अगस्त 1941 को जोरासांको हवेली (कोलकाता) में उनका निधन हो गया। यह वही जगह थी जहां उनका बचपन बीता था।

 

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