"सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली बलिदानी : वीरांगना रानी अवंती बाई लोधी"
Date : 16-Aug-2024
सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संपूर्ण भारत में किसी भी देशी राजघराने से "स्वदेश" के लिए प्रथम महिला बलिदान 20 मार्च 1858 को वीरांगना क्षत्राणी, रानी अवंतीबाई लोधी का रहा है। उल्लेखनीय है कि सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहब की दत्तक पुत्री वीरांगना मैना बाई का बलिदान 13 वर्ष की आयु में 3 सितंबर 1857 को हुआ था,जब अंग्रेजों ने उन्हें पेड़ से बाँध के जला दिया था, परंतु वे प्रथम बाल बलिदानी के रुप में दर्ज हैं, इसलिए प्रथम महिला बलिदानी रानी अवंती बाई को माना गया है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान 18 जून 1858 को और बेगम हजरत महल की मृत्यु 7 अप्रैल 1879 को हुई थी। अतः यह स्पष्ट है कि रानी अवंती बाई देश में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली महिला सेनानी थी, जिन्होंने 26 वर्ष की आयु में युद्ध लड़ते हुए स्वदेश के लिए आत्मोत्सर्ग कर अपनी पूर्णाहुति दी।
सन् 1857 के भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बरतानिया सरकार के विरुद्ध वीरांगना रानी अवंतीबाई का गौरवमयी इतिहास लिखने से पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि जिस तरह इतिहास लेखन के दौरान महारथी राजा शंकरशाह और उनके सुपुत्र रघुनाथशाह के साथ अन्याय हुआ है, उससे भी बड़ा अन्याय वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी के साथ हुआ है, इस षड्यंत्र में तथाकथित परजीवी और अंग्रेज़ों से भयाक्रांत बुद्धिजीवी इतिहासकार,अंग्रेजी पैटर्न और उनके स्रोतों को ब्रह्म वाक्य मानकर कैम्ब्रिज विचारधारा के इतिहासकार, मार्क्सवादी इतिहासकार और एक दल विशेष के इतिहासकार शामिल रहे हैं, जबकि रानी अवंतीबाई लोधी का कद और बलिदान किसी भी तरह से, झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई, अवध की बेगम हजरत महल सहित अन्य वीरांगनाओं की तुलना उन्नीस नहीं रहा है, फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर लिखे गए इतिहास में तथाकथित महान् इतिहासकारों ने उनके बारे एक पृष्ठ तो छोड़िये, एक पंक्ति नहीं लिखी है। और तो और एक उद्भट विद्वान और जाने-माने इतिहासकार राय बहादुर हीरालाल जी ने अपने गजेटियर "मंडला मयूख" में रानी अवंतीबाई लोधी के पलायन कर जाने का उल्लेख किया है क्योंकि वे अंग्रेजों के प्रभाव में थे। भारत में सन् 1857 में बरतानिया सरकार के विरुद्ध महारथी मंगल पांडे ने स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा दिया था। अविलंब ही स्वतंत्रता संग्राम का विस्तार होने लगा था। मध्य प्रांत में जबलपुर कमिश्नरी केंद्र बिंदु बन गया था, यहाँ गोंडवाना साम्राज्य के राजा शंकरशाह और रघुनाथशाह ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने के लिए बैठक आयोजित की थी, जिसमें रानी अवंतीबाई लोधी सहित विभिन्न क्षेत्रों के जमींदार और मालगुजार एकत्रित हुए थे। यहीं रानी अवंतीबाई ने सभी रियासतों को एकत्रित करने हेतु काली चूड़ियों की पुड़िया भेजने का प्रस्ताव रखा था जिसे स्वीकृत कर लिया गया। इसके अनुसार जो भी रियासत, मालगुजार और जमींदार इसे स्वीकार कर लेते थे, उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित माना जाता था।