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जब अटलजी ने हुंकार भरी 'मेरी कविता जंग का ऐलान है, हारे हुए सिपाही का नैराश्य निनाद नहीं!

Date : 16-Aug-2024

आज की उथली राजनीति और हल्के नेताओं के आचरण के बरक्स देखें तो अटलबिहारी बाजपेयी के व्यक्तित्व की थाह का आंकलन कर पाना बड़े से बड़े प्रेक्षक, विश्लेषक और समालोचक के बूते की बात नहीं। बाजपेयी जी सुचिता की राजनीति के जीवंत प्रतिमूर्ति थे। आज उनकी  पुण्यतिथि है।

पंडितजी स्वप्नदर्शी थे जबकि अटलजी ने भोगे हुए यथार्थ को जिया है। एक अत्यंत धनाढ्य वकील के वारिस पंडित जी पर महात्मा गांधी जैसे महामानव की छाया थी और आभामंडल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास। जबकि अटल जी की राजनीति गांधी जी के हत्या के बाद उत्पन्न ऐसी विकट परिस्थितियों में शुरु हुई, जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और जनसंघ के खिलाफ शंका का वातावरण निर्मित व प्रायोजित किया गया था। 
वे 1957 में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से उपचुनाव के जरिए लोकसभा पहुंचे और 1977 तक लोकसभा में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे। अजातशत्रु शब्द यदि किसी के चरित्र में यथारूप बैठता है तो वे श्रीअटल जी हैं। दिग्गज समाजवादियों से भरे प्रतिपक्ष में उन्होंने अपनी लकीर खुद तैयार की। वे पंडित नेहरू और डॉ. लोहिया दोनों के प्रिय थे। 
वाक्चातुर्य और गांभीर्य उन्हें संस्कारों में मिला वे श्रेष्ठ पत्रकार व कवि थे ही। इस गुण ने राजनीति में उन्हें और निखारा। अपने कविरूप का हुंकार भरते हुए उन्होंने परिचयात्मक शैली में कहा था- 'मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं, वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य निनाद नहीं, वह आत्मविश्वास का जयघोष है।’ 
वे 1977 के जनता पार्टी के गठन और उसके अवसान से आहत तो थे पर उनका अनुमान था कि बिना गठबंधन के 'दिल्ली’ हासिल नहीं हो सकती। सत्ता की भागीदारी के जरिए फैलाव की नीति, कम्युनिस्टों से उलट थी, इसलिए वीपी सिंह सरकार में भी भाजपा को शामिल रखा जबकि यह गठबंधन भी लगभग जनता पार्टी पार्ट-टू ही था। 1980 में जनसंघ घटक दोहरी सदस्यता के सवाल पर जनता पार्टी से बाहर निकला था और 1989 की वीपी सिंह की जनमोर्चा सरकार से राममंदिर के मुद्दे पर। 
1996 में 13 दिन की सरकार ने भविष्य के द्बार खोले तब अटलजी ने अपने मित्र कवि डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन जी की इन पंक्तियों को दोहराते हुए खुद की स्थिति स्पष्ट की थी। ''क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं। संघर्ष पथ में जो मिले, यह भी सही, वह भी सही।’’ ये पंक्तियां अटल जी के समूचे व्यक्तित्व के साथ ऐसी फिट बैठीं कि आज भी लोग इन पंक्तियों का लेखक अटल जी को ही मानते हैं न कि सुमन जी को।
अटलजी का व्यक्तित्व ऐसा ही कालजयी था कि असंभव सा दिखने वाला 24 दलों का गठबंधन हुआ, जिसमें पहली बार दक्षिण की पार्टियां शामिल हुईं। 1998 में जयललिता की हठ से एक वोट से सरकार गिरी। अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा जनभावनाएं संख्याबल से पराजित हो गईं, हम फिर लौटेंगे और एक वर्ष के भीतर ही चुनाव में वे लौटे भी और इतिहास भी रचा।
मुझे नहीं मालुम कि अटल जी ने कभी किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी की या राजनीतिक हमले किए हों। राष्ट्रहित की बातें उन्होंने दूसरों से भी लीं। इंदिरा जी के परमाणु कार्यक्रम को उन्होंने आगे बढ़ाया व 1998 की तेरह महीने की सरकार के दरम्यान पोखरण विस्फोट किए। किसी की परवाह किए बगैर देश को वैश्विक शक्ति बनाने में लगे रहे। 
यह संयोग नहीं बल्कि दैवयोग है कि उनका जन्म ईसा मसीह के जन्म के दिन हुआ। 'वही करुणा, वही क्षमा’ पर सिला भी वही ईशु की भांति ही मिला। दिल्ली से लाहौर तक बस की यात्रा की, जवाब में कारगिल मिला। पाकिस्तान को छोटा भाई मानते हुए जब-जब भी गले लगाने की चेष्ठा की, उसका परिणाम उल्टा ही मिला। अक्षरधाम, संसद हमला, एयर लाइंस अपहरण, इन सबके बावजूद भी उन्होंने जनरल परवेज मुशर्रफ को आगरा वार्ता के लिए बुलाया। लगता है अचेतन मन से आज भी अटल जी यही कह रहे हों कि हे प्रभु उन्हें माफ करना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। 
 
लेखक - जयराम शुक्ल

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