महामाया मंदिर अम्बिकापुर
छत्तीसगढ़ राज्य में देवी मंदिरों की बहुलता देखी जाती है| वनांचल प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर देवी को अलग रूप में पूजा जाता है | देवी कि आराधना के लिए शुक्रवार और मंगलवार का दिन उपयुक्त माना गया है |
आदि शक्ति दुर्गा के रूपों में एक मां महामाया जो सरगुजा में विराजी हैं. महामाया की पूजा और प्रभाव ऐसा है कि सरगुजा में मान्यता है कि इस शहर में आने वाला कभी भूखा नहीं रहता है. मंदिर के पुजारी धर्म दत्त मिश्र बताते हैं " देवी की पूजा के लिये ना कोई समय ना ही कोई विधि जरूरी है. जो जितना ज्ञानी है, वो अपने ज्ञान के अनुसार देवी की पूजा करता है. कोई मंत्रों के साथ पूजा करता है तो कोई साधारण रूप से मनोरथ मांगता है. देवी सभी की सुनती हैं. सभी के मनोरथ पूरे होते हैं | हालांकि मंगलवार और शुक्रवार को देवी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है"
"इस शहर में कोई भूखा नहीं सोता": मंदिर के एक अन्य पुजारी बताते हैं "महामाया सरगुजा राजपरिवार की ईष्ट देवी हैं | प्रमाणित इतिहास तो नहीं है लेकिन किवदंति है कि महामाया का सिर रतनपुर और धड़ अम्बिकापुर में है | माता की प्रतिमा छिन्न मस्तिका है| महामाया के बगल में विंध्यवासिनी विराजी हैं| विंध्यवासिनी की प्राणप्रतिष्ठा विन्ध्यांचल से लाकर की गई है, मान्यता है कि यहां भक्त जो भी मनौती करते हैं, वो पूरी जरूर होती है. कर्म के हिसाब से लोगों को फल जरूर मिलता है. यहां एक चमत्कार है कि इस शहर में कोई भूखा नहीं सोता है. अगर कोई दिन में यहां आ गया है तो शाम होते उसके खाने की व्यवस्था हो जाती है."”
महामाया मां को अंबिका देवी भी कहा गया है।
महामाया मंदिर का इतिहास
सरगुजा महाराजा बहादुर रघुनाथशरण सिंहदेव ने विंध्यासिनी देवी की मूर्ति को विंध्याचल से लाकर मां महामाया के साथ प्राण-प्रतिष्ठा करा स्थापित कराया।
मौखिक इतिहास से ज्ञात हुआ कि मंदिर के निकट ही श्रीगढ़ पहाड़ी पर मां महामाया व समलाया देवी की स्थापना की गई थी। समलेश्वरी देवी को उड़ीसा के संबलपुर से श्रीगढ़ के राजा लाए थे। सरगुजा में मराठा सैनिकों के आक्रमण से दहशत में आए दो बैगा में से एक ने महामाया देवी तथा दूसरे ने समलेश्वरी देवी को कंधे पर उठाकर भागना शुरू कर दिया था।
इसी दौरान घोड़े पर सवार सैनिकों ने उनका पीछा किया। इस दौरान एक बैगा महामाया मंदिर स्थल पर तथा दूसरा समलाया मंदिर स्थल पर पकड़ा गया। इसके बाद सैनिकों ने दोनों की हत्या कर दी। इस कारण महामाया मंदिर व समलाया मंदिर के बीच करीब 1 किलोमीटर की दूरी है। वहीं प्रदेश के जिन स्थानों पर महामाया मां की मूर्ति है उसके सामने ही समलेश्वरी देवी विराजमान हैं।
कलचुरि कालीन महामाया मंदिर में सिर प्रतिस्थापित रतनपुर स्थित कलचुरिकालीन महामाया मंदिर में अंबिकापुर की मां महामाया का सिर प्रतिस्थापित किया गया। रतनपुर के महामाया मंदिर में नीचे की ओर से देखने पर दो सिर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। रतनपुर मंदिर के पुजारी का दो सिर के संबंध में मानना है कि एक महालक्ष्मी व दूसरा महासरस्वती का है।
लेकिन अंबिकापुर की प्रचलित कथा का जिक्र करने पर उन्होंने भी इस सच्चाई को स्वीकार किया। यहां मां महामाया के दर्शन करने के पश्चात रतनपुर-बिलासपुर मार्ग पर स्थापित भैरव बाबा के दर्शन करने पर ही पूजा पूर्ण मानी जाती है। इस दर्शन से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामना पूरी होती हैं।
मां महामाया देवी व समलेश्वरी देवी का सिर हर वर्ष परंपरानुरूप शारदीय नवरात्र की अमावस्या की रात में प्रतिस्थापित किया जाता है। नवरात्र पूजा के पूर्व कुम्हार व चेरवा जनजाति के बैगा विशेष द्वारा मूर्ति का जलाभिषेक कराया जाता है। अभिषेक से मूर्ति पूर्णता को प्राप्त हो जाती है और खंडित होने का दोष समाप्त हो जाता है। वहीं पुरातन परंपरा के अनुसार शारदीय नवरात्र को सरगुजा महाराजा महामाया मंदिर में आकर पूजार्चना करते हैं।
प्रतिवर्ष नवरात्रि पर किया जाता है श्रृंगार –
नवरात्रि के अवसर पर शहर का दृश्य देखें तो प्रातःकाल से ही लोग कतार में माँ महामाया के दर्शन के लिए घण्टो-घण्टो तक इंतज़ार करते हैं। नवरात्रि, जो कि श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का त्योहार है साथ ही अपनी मनोकामनाओं को लेकर नवरात्रि के पहले दिन से ही लोग शहर के माँ महामाया के दर्शन के लिए व्याकुल रहते हैं। प्रतिवर्ष मंदिर की सजावट बड़े बारीकी से की जाती है। लोगों के चहलपहल से मंदिर प्रांगड़ में मानो मालूम चल जाता है कि नवरात्रि आ गई है।
