विचार शक्तिशाली होते हैं। पहले विचार के बीज आते हैं मन में, फिर वह हृदय और मस्तिष्क के गहरे तल पर जाते हैं। विचारों की धारणा मजबूत होती जाती है। जैसे ही यह धारणा मजबूत होती है, वैसे ही बीज में अंकुरण आरम्भ होता है। बीज वृक्ष बनता है। वृक्ष में फल-फूल आते हैं। बीज वट वृक्ष होता जाता है। यह विचारों के बीज सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दिशा में जा सकते हैं। आप इन विचारों को स्वहित के लिए साध सकते हैं। इन विचारों को एक समूह के हितों के लिए तैयार कर सकते हैं अथवा अहित के लिए भी विचारों का प्रयोग कर सकते हैं। मुख्य बात है कि आपके भीतर उठने वाले विचार अच्छे हैं या बुरे हैं।
हमारी विचार दृष्टि क्या लोकहित के लिए है। महापुरुषों ने लोकहित को सर्वोपरि बताया है। बुद्ध कहते हैं कि लोक से बड़ा कोई नहीं है। यहां व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है। पहले लगता है कि हमारे होने से कुछ बड़ा होने वाला है। मगर जब आप विचारों में गिरते हैं। डूबते हैं, निकलते हैं, तब यह धारणा मजबूत होती जाती है कि एक निश्चित कालखंड बाद के लिए लगा कि हमारा आपका होना कोई दुर्लभ घटना है, पर ऐसा है नहीं। यह सृष्टि हमेशा से ऐसी ही है। वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई व्यक्ति जितना एक निश्चित समय तक काम करने में नहीं थकता, उससे अधिक व्यक्ति विचारों के लगातार करने-सोचने से थक जाता है। इस अस्तित्व में शुभ और अशुभ सुख-दुख साथ-साथ है। शास्त्रों में व्यक्ति तीन तरह से गुणों रजोगुण,तमोगुण और सतोगुण से युक्त बताए गए हैं।
गीता के अध्याय 14 श्लोक 5 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐ निष्पाप उन तीनों गुणों में सतो गुण तो निर्मित होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख से सम्बन्ध और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बांधता है। यहां प्रकाश को श्रेष्ठ बताया गया है। प्रकाश ही ज्ञान है। प्रकृति में भी इन्हीं त्रिगुणा शक्तियों की महिमा बताई गई है। भारत में देवियों की संख्या तीन ही बताई गई है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेव हैं। यहां पर भी बात त्रिगुणात्मिका शक्ति की है। वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रोटान, न्यूट्रान, इलेक्ट्रॉन यहां पर भी तीन शक्तियां ही हैं। यह विज्ञान के पृथ्वी से अंतरिक्ष के सूत्र हैं। भारतीय दर्शन में सतोगुणी व्यक्ति को अच्छे विचारों वाला माना जाता है। रजोगुण वाले व्यक्ति को दूसरे और तमोगुणी को तीसरे दर्जे का व्यक्ति कहा गया है। मगर विचार तीनों तरह के मनुष्यों में उठते हैं । चाहे अच्छे विचार आएं या बुरे विचार आएं। किसी के लिए वे शुभ और किसी के लिए अशुभ हो सकते हैं। मगर विचार अपना काम करते हैं।
मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी दूरदर्शिता में छिपी होती है। किसी व्यक्ति में सहिष्णुता होती है। किसी में नहीं होती है। कोई व्यक्ति बार-बार क्रोध में गिरता है। फिर वापस होता है। क्रोध से। फिर वह पश्चाताप में गिरता है कि सम्भवत: गलत हो गया। क्रोध अकारण थे। मगर विचार उसे रुकने नहीं देते। उसे स्थिर नहीं करते हैं। व्यक्ति के विचारों में स्थिरता आ जाए तो तब ही उसे क्रोध और अक्रोध दोनों के दर्शन होते हैं। जीवन के प्रवाह के लिए स्थिरता का घटित होना भी आवश्यक है।पतंजलि कहते है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। वृत्तियों को रोकना उन्हें वापस चैतन्य धन पुरुष के पास ले जाने वाले रास्ते पर लाना योग का पहला चरण है। जैसे विक्षिप्त अवस्था मन को बिखेर देती है। तब मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दुख दो भागों में प्रकाशित होने की होती है। पतंजलि योग सूत्र प्रथम अध्याय (योगश्चित्त वृत्ति निरोध:)
हमें अपने विचारों पर लगातार ध्यान देना चाहिए। हमारे विचार कैसे हैं? क्या वे मनुष्यता के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या हमारे विचार किसी सजृन की ओर ले जा रहे हैं। क्या सृजन के सपनों के साथ पंख फैलाकर मुक्त आकाश में उड़ने वाले विचार हैं। विचारों की शक्ति मात्र समाज में व्यक्तियों के ही बीच नहीं रहती । वह शक्ति अंतरिक्ष तक जाती है। हमारे विचार हवा की तरह उड़ते हैं। चलते हैं जहां उन्हे अपने अनुरूप वातावरण मिलता है वहां वे रुकते हैं। यहां भी ध्यान रहे सृजन और विध्वंस साथ हैं। विचार हमारी चेतना को ही नहीं अपितु पदार्थ को भी प्रभावित करते हैं। एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर देना विचारों की सामर्थ्य होती है। लम्बे समय तक यह धारणा थी कि कोई पूंजीपति,दबंग व्यक्ति या अन्य शक्तिशाली लोग ही प्रगति करते हैं। अब यह धारणा विदा हो गई।
पूरी दुनिया के सभी परिवर्तन मजबूत विचारों से ही पैदा हुए हैं और परिर्वतन सम्भव हो सका है। विचार जैसे आएं, उनको आदर दीजिए। नमस्कार कीजिए। मंथन कीजिए। और अन्त में उन्हें परिष्कृत करते हुए अपने जीवन में उनके सदुपयोग का मार्ग दीजिए। आपके अच्छे विचार आपको अच्छे मार्गों की ओर जाने को प्रेरित होंगे। आप अपने विचारों को लेकर व्यक्तिगत जीवन में और राष्ट्र जीवन में क्रान्ति और शांति दोनों ला सकते हैं। आपके विचार समाज के लिए शुभ हो सकते हैं। अपने विचारों वाला संगठन बना सकते हैं। जब एक विचार के एक से अधिक व्यक्ति साथ चलते हैं, तब संगठन बन जाता है। जब वैचारिक रूप से साथ-साथ हों, तभी अच्छे संगठन और राष्ट्र समाज का निर्माण सम्भव है।
भारत में लगातार वैदिककाल से अब तक इस बात पर अधिक जोर दिया गया कि अपने मन को पवित्र रखना अति आवश्यक है। पवित्र विचारों वाले लोग ही एक समय में सफल होते हैं। पवित्र मन वाले लोग उच्च शक्ति से लैस हो जाते हैं। प्रत्येक बार हमें अपनी वैचारिक सर्जना को प्रकट करते हुए जीवन यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए। कई बार लगता है जो अच्छे विचारों वाले लोग नहीं है। उनकी प्रगति आसमान छू रही है। वे सर्वशक्तिमान दिखाई पड़ते हैं मगर ऐसे लोगों से प्रेरित होने की जरूरत नहीं लगती है। भारत में चाहे मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, श्रीकृष्ण हों, बुद्ध हों, महावीर हों, नानक हों या कबीर ,सभी सन्मार्ग पर ही चलने की बात करते हैं। आधुनिक संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भी महामार्ग की बात करते है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि स्वर्ग नर्क कहीं नहीं हमारे विचारों में है। विचार कहां से आते हैं। विज्ञान कहता है कि विचार एक ऊर्जा है। यह ऊर्जा व्यक्ति के अंतस में आती है। अमेरिकी लेखक डेल कारनेगी कहते हैं कि जीवन में मैंने सबसे महत्वपूर्ण बात सीखी तो है वह विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है। दुनिया के विचारकों और दार्शनिकों ने विचारों की ऊर्जा शक्ति को असाधारण माना है। प्रतिदिन कई बार सुखमय संसार दिखता है। अगले क्षण लगता है यह संसार रहने जैसा नहीं है। यह त्याग देने जैसा है। तो कोई कहता है यह क्षणभंगुर है। वैदिक साहित्य ढांढस देता है, कि कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखो । जीवेत शरद शतम। विचार विज्ञान को समझें। विचारों की शक्ति पर अपने समय में काफी काम हुआ है । यह माना गया कि ध्वनि ,प्रकाश और ताप की तरह चेतना क्षेत्र में विचारों की भी एक जीवंत शक्ति है। तभी अध्ययन का क्रम चला। सत्संग की व्यवस्था हुई । परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ। विचारों ने विचारों को काटा और विचारों ने विचारों का समर्थन किया। व्यक्तियों और समाजों को ऊंचा उठाने गिराने में विचारों की असाधारण भूमिका रही है। कई बार लोगों के मौलिक विचार भी नहीं होते। मगर कुछ कर गुजरने की इच्छा गहरी होती है। किसी को अपना जीवन लक्ष्य बनाने के लिए कौन से विचार ग्रहण करने चाहिए, इसका सबसे सरल उपाय है कि विचारों को सुनना होगा। फिर मन में विचार करना होगा कि हमारे कौन से विचार श्रेष्ठ हैं। यह समझना होगा कि जिन विचारों को मन में गहरे ले जा रहे हैं, उनमें हमारा सामंजस्य है या नहीं। हमारी क्षमताएं उन विचारों के क्रियान्वयन के लिए तैयार हैं । उन्हें लागू करने के लिए बड़े संयम और धैर्य की आवश्यकता होती है। बुद्धिमानी इसी में है कि जो उपलब्ध है उसी का आनंद लिया जाए।
लेखक: अरुण कुमार दीक्षित
