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विषमताओं के बीच व्यक्तित्व, परिवार, समाज, राष्ट्र निर्माण, पर्यावरण सुरक्षा और गोसंवर्धन का अद्भुत संदेश

Date : 26-Aug-2024

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी - 1

भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व,कृतित्व और चिंतन कालजयी है। उनका पूरा जीवन सक्रियता, संघर्ष और औविषमताओं से भरा रहा ।  प्रत्येक घटना, नीतियाँ, निर्णय और दर्शन मानव ही नहीं प्रकृति कल्याण केलिये प्रत्येक युग में मार्गदर्शक है ।

भगवान श्रीकृष्ण का जीवन दोनों प्रकार से श्रेष्ठतम है । वेदों को छोड़कर भारतीय वाड्मय के सभी पौराणिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण का व्यापक उल्लेख है । श्रीमद्भागवत की कथाएँ तो उनके चिंतन और दर्शन का महासागर हैं । श्रीमद्भगवतगीता में सृष्टि, प्रकृति और जीवन का ऐसा कौनसा प्रसंग है जिसके जीवन उन्नयन के सूत्र न हों। पौराणिक संदर्भ में उन्हें नारायण का अवतार माना । ब्रह्मवैवर्तपुराण पुराण में उन्हें परम् ब्रह्म का अवतार कहा । दशावतार गणना में उनका क्रम आठवाँ है। पर सोलह कलाओं से पूर्ण वे अवतार पहले और सर्व व्यापक माना गया । यदि हम मानवीय स्वरूप में देंखे तो उनका प्रत्येक कार्य और कथन असामान्य है, अलौकिक है । उनका प्रत्येक कार्य, प्रत्येक शब्द, और मार्ग दर्शन कालजयी है । समय बदला, परिस्थिति बदली, जीवन शैली और प्राथमिकताएँ भी बदल गईं लेकिन उनका संदेश हर युग में जीवन्त है । जो बीते हुये कल में भी था, आज भी है और आनेवाले समय में भी रहेगा। 
भारत का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ उनकी स्मृति के चिन्ह न हों। वे स्वयं कहीं के शासक नहीं बने लेकिन उन्होने पूरे भारत राष्ट्र को सूत्र में पिरोया । समाज को समझाने केलिये उन्होंने केवल चिंतन, मनन या संभाषण ही नहीं किया अपितु घटनाओं में सक्रिय सहभागिता का निर्वाहन भी किया । उन्होंने समाज के सभी समूहों को, हर आयु वर्ग के लोगों को उनके अनुरूप व्यक्तित्व विकास के सूत्र दिये । उनके जन्म की परिस्थिति भी असाधारण थी और संसार से विदा होने का दृश्य भी असाधारण । इसी प्रकार जीवन की हर घटना असाधारण रही । कोई कल्पना कर सकता है उस बालक के भविष्य की जिसका जन्म जेल में हुआ ? इन असाधारण परिस्थतियों और घटनाओं से लड़कर ही तो वे योगेश्वर और कर्मेश्वर बने ।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म जेल में हुआ था । जेल की परिस्थिति भी साधारण न थी । द्वार पर मृत्यु का पहरा था । जन्म लेते ही बालक को मार डालने की योजना थी । गर्भकाल में माता पिता चिंतित रहे कि कैसे जन्म के बाद बालक सुरक्षित किया जाय । इसी चिंतन में नौ माह बीते और भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि को कृष्णजी का जन्म हुआ । वह रात्रि भी घनघोर बरसात और बिजली की कड़क के साथ आई थी । जन्म की यह कथा उन माता पिता को संदेश है जो अपनी संतान को श्रेष्ठतम बनाना चाहते हैं। आधुनिक विज्ञान ने भी यह घोषित किया है कि गर्भावस्था के दौरान माता पिता के मन में जो संकल्प होता है,जैसे विचार होते हैं, वैसा ही बालक आकार लेता है । व्यक्ति का संकल्प ही वह परिस्थितियाँ निर्मित करता है जिससे विषमताओं के बीच मार्ग बनता है । कृष्णजी के जन्म क्षणों में प्रकृति के शोर के बीच कुछ सुनाई न देना और द्वारपालों का सो जाना, माता देवकी और पिता वसुदेव की संकल्पना का ही परिणाम था । और बालक को सुरक्षित गोकुल पहुँचा दिया गया । ऐसी संकल्पना और योजना का दूसरा उदाहरण औरंगजेब की जेल से शिवाजी महाराज के सुरक्षित मथुरा पहुँचने का मिलता है । 
कन्हैयाजी का बचपन गोकुल में बीता । यहाँ उन्हें यशोदाजी माता और नंद बाबा पिता के रूप में मिले । उनका पूरा बालपन सक्रियता और शारीरिक सामर्थ्य बढ़ाने में बीता । अपनी सुरक्षा के लिये मल्लयुद्ध, दंड प्रहार सीखे । गेंद फेक, कबड्डी, पत्तों में छिपना, तैरकर यमुना पारकरना, और बरसाने तक दौड़ लगाने जैसे खेलों ने उनकी शारीरिक और मानसिक सामर्थ्य बढ़ाई । जंगल के हिंसक पशुओं से गोरक्षा का सामर्थ्य भी विकसित किया । गोवर्धन प्रसंग के माध्यम से वनोपज और वनौषधि की सुरक्षा और सुरक्षित गौ अभयारण्य निर्माण का संदेश दिया । बचपन में उन पर तीन प्राणलेवा हमले हुये । उन्होंने स्वयं अपनी बल बुद्धि से सुरक्षा की । वे पूरे गाँव के बच्चों की टोली के समन्वयक थे । शरारत इतनी कि पूरे गाँव की दृष्टि में रहे । लेकिन यदि माँ ने डाँट लगाई या खंबे से बाँध दिया तो प्रतिकार में कोई शब्द नहीं । पिता से वार्तालाप में नीतियाँ समझना और अतीत के प्रसंगों के माध्यम से बौद्धिक विकास का उदाहरण भी कन्हैयाजी का है । कन्हैयाजी का बालपन आज के माता पिता को भी संदेश है और बच्चों को भी । बच्चों को क्या खेलना, किनके साथ खेलना और कैसे उनकी जीवटता में वृद्धि हो, यह स्वयं बच्चों को सोचना और माता पिता को ऐसा वातावरण देना चाहिए जिससे बच्चे पराक्रमी, पुरुषार्थी परिश्रमी बनें। और बच्चों की शरारतें भी सकारात्मक होनी चाहिए। विध्वंसात्मक नहीं। कन्हैया जी की बाल लीला में विध्वंसात्मक उदाहरण एक भी नहीं है । माता पिता का कैसा आदर होना चाहिए यह भी उनके बाल प्रसंगों में है । 
कन्हैयाजी जब ग्यारह वर्ष, सात माह के हुये तब अक्रूरजी लेने आये । उनके साथ मथुरा आये मथुरा का शासक कंस था । कंस अपने पिता उग्रसेन को जेल में डालकर शासक बना था । उग्रसेन रिश्ते में कन्हैयाजी के नाना थे । कन्हैया जी ने मल्लयुद्ध करके कंस का वध किया और नानाजी को जेल मुक्त करके पुनः सिंहासन पर बिठाया । अपने माता पिता को भी मुक्त किया और राज दरबार में सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठित किया । उन्होंने माता यशोदा और बाबा नंद को भी मथुरा आमंत्रित किया वे आये भी, लेकिन कुछ दिन रुककर लौट गये । कन्हैयाजी ने उन्हें सम्मानित करके विदा किया । वे चाहते तो स्वयं मथुरा के शासक बन सकते थे । लेकिन उन्होंने स्वयं सत्ता नहीं संभाली और अपने परिवार और कुटुम्बी जनों को सम्मानित किया । द्वारिका की सत्ता सृजित करके भी वे शासक नहीं बने उन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता बलराम को राजा बनाया । 
परिवार, कुटुम्ब को सम्मानित करने के साथ अपना अपमान झेलकर सभी परिवार कुटुम्ब के साथ सभी सामान्य नागरिकों का संरक्षण किया था । कंस वध के बाद मथुरा पर मगध नरेश जरासंध का आक्रमण हुआ । वह बहुत बली था । उसका समाना मथुरा की सेना नहीं कर सकती थी । युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण जी ने मथुरा का विनाश न करने और किसी सामान्य नागरिक को कोई क्षति न पहुँचाने का आग्रह किया । जरासंध ने कन्हैयाजी के सामने युद्ध मैदान से पीठ दिखाते हुये अकेले निकलने की शर्त रखी । श्रीकृष्ण जी ने शर्त स्वीकार कर ली । वे युद्ध मैदान छोड़कर चले गये । इस घटना के कारण उनका नाम "रणछोड़" पड़ा। 
नदी वन और पर्वत पर्यावरण के महत्वपूर्ण आधार हैं। यदि नदी, वन और पर्वत सुरक्षित हैं तो पर्यावरण सुरक्षित रहेगा । और पर्यावरण की सुरक्षा जीवन की सुरक्षा है । भगवान श्रीकृष्ण के पूरे जीवनवृत में पर्यावरण के संरक्षण का अद्भुत संदेश है। गोकुल, मथुरा, उज्जैन और द्वारिका में उनके द्वारा किये गये कार्य इसके उदाहरण हैं। गोकुल क्षेत्र में कालियानाग ने यमुना नदी के जल को प्रदूषित कर रखा था । उसने इतना प्रदूषण फैलाया कि जल विषाक्त हो गया था । लोग आसपास के घाटों पर स्नान करने से डरते थे । अपनी विशिष्ट रणनीति और साहस से श्रीकृष्ण जी ने कालियानाग को घाट छोड़ने पर विवश किया । यमुना जल को प्रदूषण मुक्त हुआ । और पुनः निर्मल जल की धार प्रवाहित होने लगी । शिक्षा केलिये उज्जैन आये तो यहाँ उन्होंने गौमती कुण्ड का निर्माण किया। पर्वतों के संरक्षण का संदेश गोवर्धन पर्वत की पूजन में निहित है । वहीं वनों के संरक्षण का संदेश द्वारिका के स्थान चयन और निर्माण की शैली से मिलता है । मथुरा से द्वारिका की दूरी का हम अनुमान लगा सकते हैं। मथुरा छोड़ने के बाद उन्हें अपने लिये कोई नया नगर बसाना था । इसके लिये वे रास्ते के वन या पर्वतीय क्षेत्र चुन सकते थे, जिन्हें साफ करके द्वारिका बसा सकते थे । लेकिन उन्होंने सैकड़ों योजन दूर खाली पड़ी दलदली भूमि चुनी । उस धरती से दलदल हटाकर द्वारिका नगर बसाया । निर्माण केलिये पत्थर जुटाने केलिये पर्वतों का कटाव नहीं किया और लकड़ी के लिये वन उजाड़े। उन्होंने बिखरे हुये पत्थर एकत्र किये और समुद्र में बहकर आने वाली लकड़ियों का उपयोग किया । जल पर्वत और वन संरक्षण का यही संदेश जगन्नाथपुरी के निर्माण में है । जिसका पालन आज भी प्रतिवर्ष जगन्नाथ यात्रा में किया जाता है । 

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