18 सितम्बर 1948 निजाम का समर्पण और हैदराबाद भारत का अंग बना | The Voice TV

Quote :

"मेहनत का कोई विकल्प नहीं, बस मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ते रहो।"

Editor's Choice

18 सितम्बर 1948 निजाम का समर्पण और हैदराबाद भारत का अंग बना

Date : 18-Sep-2024

108 घंटे लगे थे सैन्य अभियान में 

पूरे संसार में केवल भारत ऐसा देश हैं जहां स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्रता का स्वरूप लेने के लिये भी लाखों बलिदान हुये और करोड़ो लोग बेघर हुये । जिन स्थानों पर स्वतंत्रता के बाद भी भारी हिंसा और संघर्ष हुआ उनमें एक हैदराबाद रियासत भी रही है । जहाँ सेना के हस्तक्षेप के बाद ही हिंसा रुक सकी और और वह भूभाग भारतीय गणतंत्र का अंग बन सका । सेना ने 13 सितम्बर को हैदराबाद में प्रवेश किया, 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद के निजाम ने समर्पण किया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हैदराबाद के शासक निजाम के हस्ताक्षर हुये ।
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में तीन प्रकार का प्रशासनिक स्वरूप था । एक जो सीधा अंग्रेजों के आधिपत्य में था, दूसरा वह अंग्रेजों का ध्वज और दासता तो थी किंतु निचले स्तर पर किसी राजा या नबाब का शासन था । और तीसरा डच या फ्रांसीसी सत्ता के हाथ । जून 1947 में वायसराय माउंटवेटन द्वारा बनाये गये फार्मूले से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तो मिली पर यह स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश आधिपत्य वाले क्षेत्रों तक ही सीमित थी । अंग्रेज जा तो रहे थे लेकिन वे एक ऐसे भारत की नींव बनाकर जा रहे थे जो सतत गृह कलह और रक्तपात में ही उलझा रहे । उन्होंने एक चाल चली । अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को भी स्वतंत्रता दी थी और उनसे कहा था कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें अथवा भारत या पाकिस्तान किसी में मिल लें । इसका लाभ कुछ रियासतों ने उठाया उसमें हैदराबाद भी थी । सभी रियासतों को जून 1947 में ही इस फार्मूले की सूचना मिल गयी थी । सूचना मिलते ही जून 1947 में हैदराबाद के शासक निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने का पत्र भेज दिया था और स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी । निजाम को इस काम में अंग्रेजों का मौन और मोहम्मद अली जिन्ना का खुला समर्थन मिल गया था । लेकिन हैदराबाद रियासत की जनता निजाम शासन से मुक्ति चाहती थी । वह भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना चाहती थी । इसका कारण हैदराबाद के शासकों का समाज पर दमन और अत्याचार करना था । हैदराबाद रियासत में बहुमत तो हिन्दु परंपरा को मानने वालों का था लेकिन वहां कानून इस्लामिक शरीयत के अनुसार चलता था । यह कानून हैदराबाद में 1720  से ही लागू हो गया था । यह निजाम शाही के आरंभ होने का वर्ष था । और जब 1798 में निजाम अंग्रेजों के आधीन हो गया तब भी आतंरिक शासन व्यवस्था में कोई अंतर न आया । हैदराबाद में धार्मिक सत्ता के अधिकारों का दुरुपयोग, बहुसंख्यक समाज का शोषण और उत्पीड़न का क्रम बना रहा । इसलिये हैदराबाद का बहुसंख्यक निजाम से मुक्ति चाहता था ।
 हैदराबाद के नबाब को "निजाम-उल-मुल्क" की उपाधि मुगल बादशाह ने दी थी जिससे हैदराबाद का हर नबाब निजाम कहलाया । रियासत का आधिकारिक धर्म ही इस्लामिक प्रावधानों के अनुसार नहीं था अपितु अधिकांश शासकीय पदों पर भर्ती भी मुस्लिम समाज के लोगों  की जाती थी । शीर्ष पदों पर तो एक भी गैर मुस्लिम नहीं था । रियासत को अंग्रेजों ने अपने आधीन तो कर लिया था पर रियासत के अदरूनी व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया था । इसका कारण यह था कि अंग्रेजों को शासन व्यवस्था में कोई रूचि न थी । उनके केवल दो उद्देश्य थे । एक तो हैदराबाद रियासत से सालाना पैसा मिले और दूसरा आवश्यकता पड़ने पर निजाम उनकी सहायता के लिये अपने खर्चे पर सेना भेजे । निजाम इस काम को सहर्ष कर रहा था । अंग्रेजों को निजाम की जरूरत मराठों के विरुद्ध अभियान शुरु करने के लिये पड़ती थी । इसलिए उन्होने निजाम को कुछ विशेष अधिकार भी दे रखे थे । निजाम के मन में मराठा शासन के प्रति कितनी कटुता थी इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मराठों ने भोपाल में अभियान चलाया तो भोपाल नबाब की मदद करने के लिये  निजाम की फौज भोपाल आई थी । यह अलग बात है कि भोपाल के युद्ध में इस संयुक्त फौज को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा । निजाम इससे पूर्व भी मराठों से पराजित हो चुका था इसलिये उसने अंग्रेजों से संधि कर ली थी । निजाम का सोच कितना साम्प्रदायिक था इसका एक उदाहरण यह भी है कि हैदराबाद रियासत में मुस्लिम आबादी केवल 11% प्रतिशत थी लेकिन रियासत की तीस प्रतिशत भूमि पर मुसलमानों का अधिकार था । इसके  साथ वहां हिन्दुओं को हथियार रखने का अधिकार न था जबकि मुस्लिम समाज के पास हथियारों का जखीरा रहता था । 
हैदराबाद की इस विशिष्ट विचार और कार्य शैली कटुता और आक्रामकता 1921 के बाद और बढ़ी । यद्धपि रियासत के अधिकांश मुसलमान धर्मान्तरित थे उन्हे इसका आभास भी था लेकिन खिलाफत आँदोलन के बाद मुसलमानों में संगठन और आक्रामकता दोनों बढ़ी । अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भी हुये । इसमें तेजी 1927 के बाद और बढ़ी इस वर्ष रियासत में एक संस्था "मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन" का गठन हुआ । इसका नेतृत्व सैय्यद कासिम रिजवी के हाथ में था । इस संस्था ने सशस्त्र समूह बनाया इसे "रजाकारों का संगठन" कहा गया । इस संगठन ने 1946 के डायरेक्ट ऐक्शन में बड़ी सक्रियता दिखाई और मुस्लिम समाज में अपनी पैठ और बढ़ा ली थी । इसके साथ जैसे जैसे स्वतंत्रता के क्षण समीप आ रहे थे यह संगठन और गहरी पकड़ बनाने लगा । 1946 के बाद निजाम इसी संगठन पर निर्भर हो गये थे । जून 1947 से हैदराबाद निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी । 15 अगस्त 1947 को निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र होने की और कासिम रिजवी ने इसे इस्लामिक देश होने की घोषणा कर दी । इस घोषणा के साथ हैदराबाद रियासत में हिंसा की शुरुआत हो गयी । रजाकारों और रियासत की सेना मिलाकर यह संख्या लगभग दो लाख थी जो हथियारों से युक्त थी  अनेक स्थानों पर दमन लूटपाट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण का सिलसिला चल पड़ा । सैकड़ो हजारों परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर भागे । आरंभ में भारत सरकार कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला  विभाजन के साथ बढ़ती हिंसा और शरणार्थियों की समस्या से जूझ रही थी इस कारण हैदराबाद की ओर ध्यान कम गया । तभी 1948 के आरंभ में यह सूचना मिली कि हैदराबाद में पाकिस्तान से सशस्त्र सैनिक आ रहे हैं उन्हें बसाया जा रहा है और रियासत हथियारों की खरीद के लिये आस्ट्रेलिया और चेकोस्लोवाकिया से 30 लाख पाउंड के हथियार खरीदने के आर्डर दिया है । तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने निजाम से बातचीत की किंतु निजाम के रवैये में कोई अंतर न आया उल्टे रिजवी की रजाकारों की गतिविधियां और बढ़ी । सरदार पटेल ने अंततः 9 सितम्बर 1948 को चेतावनी पत्र जारी किया । लेकिन निजाम न माना । 11 सितम्बर को हैदराबाद में सैन्य अभियान का निर्णय हुआ । इस अभियान को "आपरेशन पोलो" नाम दिया गया ।  12 सितम्बर को सेना को कूच करने का आदेश दिया । 13 सितम्बर को सेना ने हैदराबाद आपरेशन आरंभ किया, 17 सितम्बर की शाम को निजाम ने समर्पण का प्रस्ताव दिया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुये । सेना को इस अभियान में कुल 108 घंटे लगे । इस 108 घंटे के अभियान में सेना के कुल 329 जवानों के प्राणों का बलिदान हुआ । दूसरी तरफ निजाम सेना के 807और 1647 अन्य लोगों की मौत हुई । जून 1947 से सितम्बर 1948 के बीच इस लगभग सवा साल की अवधि में 22 से 30 हजार तक लोग मारे गये और एक लाख से अधिक लोग बेघर हुये । इस हिंसा पर विराम भारत सरकार की सक्रियता के साथ लगी । भारत सरकार ने कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया और उसकी संस्था मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन यनि MIM पर पाबंदी लगा दी । आगे कासिम रिजवी पाकिस्तान चला गया । वह इस संस्था की कमान अपने समय के मशहूर वकील अब्दुल वहाद औबेसी को सौंप गया था । वे इस समय के आक्रामक नेता औबेसुद्दीन औवेसी के पितामह थे । 
हैदराबाद रियासत कि क्षेत्रफल लगभाग 82 हजार वर्ग मील था । जो इंग्लैंड जैसे देश से भी अधिक है । तब इस रियासत की आबादी लगभग 1.6 करोड़ थी इसमें 85%हिन्दु, 11% मुसलमान और 4% अन्य थे । रियासत की वार्षिक आय लगभग 26 करोड़ वार्षिक थी । यह देश की दूसरी बड़ी रियासत मानी जाती थी । हैदराबाद के भारतीय गणतंत्र में विलीन होने के बाद भारत सरकार इन सारी घटनाओं की जाँच के लिये "सुन्दर लाल समिति" भी बनाई लेकिन राजनैतिक कारणों से यह रिपोर्ट सामने न आ सकी । इसे सार्वजनिक करने से रोक दिया गया था । इसके कुछ अश 2014 में ही सामने आ सके । हैदराबाद के विलीनीकरण के बाद भी किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर न था उन निहत्थे सामान्य लोगों ने किसका क्या बिगाड़ना था जिन्हें हैदराबाद के आक्रामक जुनीनी लोगों ने लूटा, सब कुछ छीना, महिलाओं से बलात्कार किया और कुछ को मौत के घाट उतार दिया ।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देशभर के वकीलों के लिए गर्मी के मौसम में ड्रेस कोड में ढील देने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।  याचिका में सुझाव दिया गया था कि वकील गर्मी के कारण पारंपरिक गाउन पहनने में असुविधा महसूस कर रहे हैं, किंतु सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने जब इस याचिका को सुना तब साफ कह दिया कि पेशेवर शिष्टाचार बनाए रखना आवश्यक है। अलग-अलग स्थानों पर जलवायु के अनुसार वकीलों को पेशेवर रूप से व्यवहार करना चाहिए। वकील कुर्ता-पायजामा या शॉर्ट्स-टी-शर्ट पहनकर बहस नहीं कर सकते। वकीलों को यह समझना चाहिए कि उनकी वेशभूषा उनके पेशेवर आचरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि अदालतें वकीलों के लिए एक निश्चित स्तर की पेशेवरता की अपेक्षा करती हैं, जिससे अदालत की गरिमा बनी रहे।
आप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वकीलों के लिए पेशेवरता और गरिमा का पालन आवश्यक है। यह न केवल उनके व्यक्तिगत चित्रण को दर्शाता है, बल्कि यह अदालत की छवि और उसकी गंभीरता को भी बनाए रखता है। अब उच्‍चतम न्‍यायालय के आए इस निर्णय की तुलना कोर्ट के पिछले माह दिए गए निर्णय से करते हैं, बात वहां भी ड्रेस कोड की ही थी, किंतु यही माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीशों के निर्णय ने जैसे एक समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। कहना होगा कि नौ अगस्‍त को आए एक निर्णय में आज फिर से एक बार उच्‍चतम न्‍यायालय के निर्णय पर विचार करने के लिए विवश कर दिया है। पूरी कहानी कुछ यूं है कि मुंबई के एन. जी. आचार्य और डी. के. मराठे कॉलेज ने कैंपस में हिजाब, नकाब, बुर्का, स्टोल और टोपी पहनने पर बैन लगाया था। इस निर्णय के विरोध में नौ लड़कियां बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंची । हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में कॉलेज सर्कुलर लागू करने पर 18 नवंबर तक रोक लगा दी। 
यहां जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ का कहना रहा, 'स्टूडेंट्स को क्या पहनना या क्या नहीं पहनना है, यह वही तय करेंगे। एजुकेशनल इंस्टीट्यूट स्टूडेंट्स पर अपनी पसंद नहीं थोप सकते।' पीठ ने मुस्लिम छात्रों के लिए ‘ड्रेस कोड’ को लेकर जन्में नए विवाद के केंद्र में आए कॉलेज प्रशासन से कहा, ‘‘छात्राओं को यह चयन करने की आजादी होनी चाहिए कि वे क्या पहनें और कॉलेज उन पर दबाव नहीं डाल सकता… यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपको अचानक पता चलता है कि देश में कई धर्म हैं।’’ अगर कॉलेज का इरादा छात्राओं की धार्मिक आस्था के प्रदर्शन पर रोक लगाना था, तो उसने ‘तिलक’ और ‘बिंदी’ पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया? 
अब जरा उस सर्कुलर को भी देख लेते हैं, जोकि कॉलेज की ओर से जारी किया गया था, वस्‍तुत: इसमें तीन बिन्‍दुओं में बात रखी गई है। ‘’एक - छात्रों को परिसर में औपचारिक और सभ्य पोशाक पहननी चाहिए। वे हाफ शर्ट या फुल शर्ट और ट्राउजर पहन सकते हैं। लड़कियां कोई भी भारतीय या पश्चिमी पोशाक पहन सकती हैं। छात्रों को ऐसा कोई भी परिधान नहीं पहनना चाहिए जो धर्म या सांस्कृतिक असमानता को दर्शाता हो। नकाब, हिजाब, बुर्का, स्टोल, टोपी, बैज आदि को ग्राउंड फ्लोर पर कॉमन रूम में जाकर उतारना होगा और उसके बाद ही वे पूरे कॉलेज परिसर में घूम सकते हैं। जींस, टी-शर्ट, रिवीलिंग ड्रेस और जर्सी की अनुमति नहीं है। दो- अपने व्याख्यान / प्रैक्टिकल के लिए समय से पहले पहुंचें। तीन- 75% उपस्थिति अनिवार्य है। शिक्षा में अनुशासन सफलता की कुंजी है।’’  यहां गहराई से देखने पर कहीं प्रतीत नहीं हो रहा है कि एक विशेष समुदाय को टार्गेट करके यह आदेश महाविद्यालयों ने निकाला था। 
हालांकि हम मानकर चलते हैं कि जिस ‘बिंदी’का न्‍यायालय हवाला दे रहा था, उसके बारे में न्‍यायालय को यह भलिभांति पता ही होगा कि सिर्फ हिन्‍दू युवतियां ही ‘बिंदी’ नहीं लगातीं, उसे तो अन्‍य तमाम मत, पंथों, रिलीजन, मजहब को माननेवाली महिलाएं भी लगाती हैं। यानी कि  बिंदी की सार्वजनिक स्‍वीकृति है। तिलक भी बिंदी की तरह ही एक भाग है, फिर कोर्ट को यह भी पता ही है कि सिख पगड़ी पहनते हैं, उन्‍हें ये अधिकार सार्वजनिक रूप से हर जगह सामाजिक स्‍वीकृति के तहत पूरी तरह से मान्‍य किया गया है। फिर यह स्‍वीकार्यता इसलिए भी है क्‍योंकि भारत की सिख आबादी 20.8 मिलियन है, जो देश की कुल संख्‍या का केवल 1.72% है। इसका अर्थ है कि एक कक्षा में एक छात्र या अधिकतम दो ही मुश्‍किल से सिख होंगे, किंतु क्‍या यह मुसलमानों पर लागू होता है। वह तो देश की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्‍या है। 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350ए तथा 350बी में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का प्रयोग किया गया है लेकिन इसकी परिभाषा कहीं नहीं दी गई है। यह विडंबनापूर्ण स्थिति है कि कहीं पर कोई समुदाय जो 96, 98 प्रतिशत है वह अल्पसंख्यक है और वहीं, किसी राज्य में 2 प्रतिशत आबादी वाले लोग बहुसंख्यक हैं और अल्पसंख्यक को मिलने वाले लाभ से वंचित हैं। संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, ‘ऐसा समुदाय जिसका सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से कोई प्रभाव न हो और जिसकी आबादी नगण्य हो, उसे अल्पसंख्यक कहा जाएगा।’ किंतु क्‍या यह परिभाषा भारत में रह रहे मुसलमानों पर लागू होती है ? अल्‍पसंख्‍यक की अब तक कि परिभाषाएं उठाकर देखें, इनमें साफ है कि दो प्रतिशत या अधिकतम 10 प्रतिशत से कम कुल जनसंख्‍या का अल्‍पसंख्‍यक समुदाय कहलाएगा, पर भारत में मुसलमान जैसा कि वे स्‍वयं कहते हैं कि 20 करोड़ से अधि‍क हैं, जोकि स्‍वभाविक तौर पर कुल जनसंख्‍या का 14 प्रतिशत या इससे कुछ अधिक हो जाता है । 
दूसरी ओर राज्‍यीय स्‍तर पर भी इसकी समीक्षा की जाए तो  हिंदू जो राष्ट्रव्यापी आंकड़ों के अनुसार एक बहुसंख्यक समुदाय है, पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों और जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक है।  लक्षद्वीप में 96.20% और जम्मू-कश्मीर में 68.30% मुसलमान हैं, जबकि असम (34.20%), पश्चिम बंगाल (27.5%), केरल (26.60%), उत्तर प्रदेश (19.30%) और बिहार (18%) में भी इनकी अच्छी-खासी जनसंख्या है फिर भी इन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है और वे इसका लाभ ले रहे हैं। दूसरी ओर वे समुदाय, जो वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक हैं, राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त न होने के कारण लाभ से वंचित हैं। विडम्‍बना देखिए; लक्षद्वीप में मात्र दो प्रतिशत हिंदू हैं लेकिन वे वहाँ अल्पसंख्यक न होकर बहुसंख्यक हैं और 96% प्रतिशत आबादी वाले मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। ईसाई मिजोरम, मेघालय, नगालैंड में बहुसंख्यक हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल मे भी इनकी संख्या अच्छी है, इसके बावजूद ये अल्पसंख्यक माने जाते हैं। यह गैर-बराबरी है। इसे एड्रेस किये जाने की ज़रूरत है। किंतु हर उस मुद्दे में जिसमें न्‍यायालय को लगता है हस्‍तक्षेप करना चाहिए वह करती है, पर यहां इस मुद्दे पर वह अभी तक चुप नजर है। 
यहां माननीय न्‍यायालय को भी समझना होगा कि उसके प्रश्‍न करने का कौई औचित्‍य नहीं, वह समाधान देने के लिए है और उनका दिया गया निर्णय कानूनी स्‍तर पर ही नहीं तर्क सम्‍मत भी होना चाहिए । आप सोचिए, यदि किसी भी कक्षा में अकेले मुसलमान जोकि देश में आज के समय में 100 में 20 या इससे अधिक अलग-अलग राज्‍यों के हिसाब से कहीं-कहीं तो 96 और 68 प्रतिशत तक हैं, वह अपने मजहबी परिधान को पहनकर कक्षा में पहुंचेंगे तो कक्षा की स्‍थ‍िति क्‍या होगी, क्‍या यह कक्षा किसी पंथ निरपेक्ष श्रेणी में आएगी? जैसा कि संविधान हवाला देता है(परिभाषा धर्मनिरपेक्षता) । इसी तरह से यदि हिन्‍दू और अन्‍य अल्‍पसंख्‍यक जहां भी जिस राज्‍य में बहुसंख्‍यक हैं वे अपने पारंपरिक पोशाकों में पाश्‍चात्‍य स्‍वीकृत शिक्षा व्‍यवस्‍था के संस्‍थानों में जाने लगे तब वहां कैसी स्‍थ‍िति होगी। क्‍या यह स्‍थ‍िति किसी सांस्‍कृतिक मेले या सामुदायिक मेले जैसी नहीं होगी? फिर वहां शिक्षा की एक रूपता एवं सामने से एक समान दिखनेवाली दृष्टि कैसे आएगी? 
इस मामले में थोड़ा विचार उच्‍च न्‍यायालय पहुंचने के पहले बॉम्बे हाईकोर्ट के दिए निर्णय पर भी कर लेते हैं। दरअसल, छात्राओं की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि यह नियम उनके मजहब का पालन करने के मौलिक अधिकार, निजता और पसंद के अधिकार का उल्लंघन करता है। इस पर उच्‍च न्‍यायालय ने कहा कि सभी छात्रों पर ड्रेस कोड लागू है, चाहे वह किसी जाति या धर्म का क्यों न हो। ड्रेस कोड को अनुशासन बनाए रखने के लागू किया गया है। यह संविधान के तहत शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और प्रशासन के मौलिक अधिकार के अनुरूप है। न्‍यायालय ने कहा- यह छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। इसी बयान के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था। इससे पहले कर्नाटक में इसी तरह के विवाद पर 15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने कॉलेज यूनिफॉर्म को जरूरी बताया था ।
यहां प्रिंसिपल का तर्क भी समझना होगा- छात्रों को एडमिशन के समय ही बताया गया था कि छात्र ठीक-ठाक कपड़े पहनें। क्योंकि नौकरी मिलने के बाद भी उन्हें ऐसा ही करना होगा। साल के 365 दिनों में से छात्रों को मुश्किल से 120-130 दिन ही कॉलेज में रहना पड़ता है। इन दिनों ड्रेस कोड का पालन करने में उन्हें क्या परेशानी होनी चाहिए? छात्रों द्वारा कैंपस में अभद्र व्यवहार के कई मामलों के कारण ही प्रशासन को नया ड्रेस कोड लाना पड़ा। हालांकि अभी उच्‍च्‍तम न्‍यायालय पीठ ने कहा है कि उसके अंतरिम आदेश का किसी के द्वारा दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए, फिर भी जो संदेश देश भर में दिया जाना चाहिए वह चला गया है और वह कहीं से भी यह नहीं दर्शाता कि ये समान रूप से सभी के हित में है। अब जब सुप्रीम कोर्ट में ड्रेस कोड पर बहस हुई है तो उसे अन्‍य शिक्षण संस्‍थानों की सद्इच्‍छा और भावना को भी समझना चाहिए, यहां यही कहना है।

 


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement