कृषि उत्पादों पर शून्य आयात शुल्क से ख़तरे में किसानों का भविष्य, केंद्र सरकार खामोश : विक्रमादित्य सिंह | The Voice TV

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कृषि उत्पादों पर शून्य आयात शुल्क से ख़तरे में किसानों का भविष्य, केंद्र सरकार खामोश : विक्रमादित्य सिंह

Date : 04-Feb-2026

 शिमला, 04 फ़रवरी । लोक निर्माण एवं शहरी विकास मंत्री विक्रमादित्य सिंह ने भारत-अमेरिका संभावित व्यापार समझौते को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि यदि इस समझौते के तहत कृषि उत्पादों पर शून्य आयात शुल्क लागू किया गया तो इससे देश की कृषि व्यवस्था और करोड़ों किसानों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

विक्रमादित्य सिंह ने बुधवार को एक बयान में कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया है कि भारत अमेरिका से ऊर्जा, तकनीक और कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद के लिए तैयार है और आयात शुल्क तथा अन्य बाधाएं हटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनका कहना है कि यदि ऐसे फैसले किसानों, संसद और राज्यों से बिना चर्चा के लिए जाते हैं, तो यह किसानों के हितों के साथ सीधा विश्वासघात होगा।

उन्होंने कहा कि भारत की खेती आज भी छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है। ऐसे किसानों को अमेरिका जैसे देशों की सब्सिडी आधारित, कॉरपोरेट खेती से सीधी प्रतिस्पर्धा में डालना किसी भी तरह से उचित नहीं है। यदि अमेरिकी अनाज, दालें, तिलहन, फल-सब्जियां और डेयरी उत्पाद बिना या बहुत कम शुल्क के भारत आते हैं, तो इससे घरेलू बाजार में कीमतें गिरेंगी, किसानों की आय और घटेगी और ग्रामीण इलाकों में रोजगार का संकट और गहरा होगा।

विक्रमादित्य सिंह ने यह भी कहा कि डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र पर भी दबाव बनाए जाने की खबरें चिंताजनक हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि केंद्र सरकार अब तक यह साफ क्यों नहीं कर रही है कि किन कृषि उत्पादों को शून्य शुल्क के दायरे में लाया जा रहा है और इसका भारतीय किसानों पर क्या असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ अमेरिका अपने किसानों को इस समझौते के फायदे गिना रहा है, वहीं भारत सरकार अपने किसानों को लेकर पूरी तरह चुप है।

उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा हालात में देश की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सौदेबाजी का माध्यम बना दिया गया है, जिसकी कीमत किसानों को बढ़ते कर्ज, लागत और प्राकृतिक आपदाओं के बीच चुकानी पड़ेगी। उनका कहना है कि इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते पर संसद में चर्चा, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सलाह और किसान संगठनों से संवाद जरूरी है, लेकिन फैसले बंद कमरों में लिए जा रहे हैं।


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