वह्वशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः ।
स्वामिभक्तश्च शूरश्च षडेते श्वानतो गुणाः ॥
आचार्य चाणक्य यहां सन्तोष, सतर्कता और स्वामिभक्ति की चर्चा करते हुए कुत्ते के सन्दर्भ में इन गुणों का बखान करते हुए इनकी आवश्यकता की दृष्टि से कहते हैं कि अधिक भूखा होने पर भी थोड़े में ही सन्तोष कर लेना, गहरी नींद में होने पर भी सतर्क रहना, स्वामिभक्त होना और वीरता कुत्ते से ये छः गुण सीखने चाहिए।
आशय यह है कि कुत्ता कितना ही भूखा क्यों न हो, उसे जितना मिल जाए, उसी में सन्तोष कर लेता है। साथ ही उसे जितना खिला दो, वह सब खा जाता है। थोड़ी ही देर में उसे गहरी नींद आ जाती है। किन्तु गहरी नींद में भी वह थोड़ी-सी आहट पाते ही जाग जाता है। मालिक के साथ वफादारी और बहादुरी से किसी पर झपट पड़ना भी कुत्ते की आदत हैं। कुत्ते से इन्हीं छः गुणों को सीखना चाहिए।
