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जलशक्ति मंत्री पाटिल ने समुदाय आधारित मल कीचड़ प्रबंधन मॉडलों की सराहना की

Date : 07-Jan-2026

 नई दिल्ली, 07 जनवरी । केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के तहत सभी राज्यों से बातचीत की और समुदाय की मदद से चल रहे मल कीचड़ प्रबंधन (एफएसएम) के नए मॉडल की तारीफ की।

जलशक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की ओर से मंगलवार को आयोजित वर्चुअल संवाद में पाटिल ने कहा कि शौचालय बनाना ही काफी नहीं है, उसे सुरक्षित तरीके से खाली करना, ले जाना, ट्रीट करना और दोबारा इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है। ओडिशा के खोरधा जिले में ट्रांसजेंडर समूह द्वारा फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (एफएसटीपी) चलाने की पहल को उन्होंने सबसे प्रेरक उदाहरण बताया, क्योंकि इससे सफाई भी हो रही है और लोगों को काम भी मिल रहा है।

संवाद में जलशक्ति राज्यमंत्री वी सोमन्ना, सचिव अशोक केके मीणा और स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण की मिशन निदेशक ऐश्वर्या सिंह भी शामिल हुए। अलग-अलग राज्यों के जिला कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ, पंचायत सदस्य और स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की महिलाएं और सदस्य भी ऑनलाइन जुड़े।

मंत्रालय ने बताया कि गुजरात के डांग जिले के आदिवासी इलाकों में ट्विन-पिट शौचालय का बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है। सिक्किम के मंगन जिले में सिंगल-पिट को ट्विन-पिट में बदलने का काम तेजी से किया गया, ताकि एफएसएम के नियम पूरे हो सकें। मध्य प्रदेश के इंदौर की कालीबिल्लौद ग्राम पंचायत में देश का पहला ग्रामीण एफएसटीपी है, जहां ट्रीट किए पानी में मछली पालन का भी प्रयोग हो रहा है और साथ में एमआरएफ सेंटर भी बनाया गया है। इससे पंचायतों को कमाई का नया जरिया मिला है।

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में एसएचजी की मदद से क्लस्टर एफएसटीपी मॉडल चलाया जा रहा है, जिसमें रखरखाव की जिम्मेदारी भी स्थानीय समूह संभाल रहे हैं। लद्दाख के लेह जिले में कड़ाके की ठंड और ऊंचाई को देखते हुए इकोसैन शौचालय बनाए गए हैं। त्रिपुरा के गोमती जिले में मेले और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए मोबाइल बायो-टॉयलेट लगाए गए हैं, जिन्हें एसएचजी खुद चला रहे हैं और यह मॉडल अपने खर्च खुद निकालने में भी सफल रहा है। संवाद के दौरान लोगों को अपनी बात स्थानीय भाषा में रखने के लिए कहा गया, जिससे समुदाय के लोग खुलकर अपने अनुभव बता सके।

मंत्री पाटिल ने कहा कि गांवों में एफएसएम तभी सफल होगा जब पंचायत, एसएचजी और आम लोग मिलकर काम करें और तकनीक भी जगह के हिसाब से चुनी जाए। मुश्किल हालात में किए गए ये प्रयोग दिखाते हैं कि गांव भी शहरों से कम नहीं, जब बात नए समाधान ढूंढने की हो।


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