मंदिर श्रृंखला:- पुजारिनों का धाम तुरतुरिया Date : 21-Oct-2024 तुरतुरिया एक प्राकृतिक एवं धार्मिक स्थल है | वाल्मीकि रामायण के अनुसार , त्रेतायुग में भगवान श्री राम के परित्याग के बाद माता सीता तुरतुरिया में महर्षि वाल्मीकि आश्रम में रहने लगी और यही सीता माँ ने लव और कुश को जन्म दिया। वाल्मीकि ने उनका पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा प्रदान की। माना जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने यहां तपस्या की थी और उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था। तथा उन्होंने रामायण की रचना भी इसी स्थान पर की थी। यह स्थान छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले में 29 किमी दूर कसडोल तहसील में स्थित है। इस स्थान को सुरसुरी गंगा के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थल प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ एक मनोरम स्थान है जो कि पहाड़ियो से घिरा हुआ है। इसके समीप ही बारनवापारा अभ्यारण भी स्थित है। तुरतुरिया बहरिया नामक गांव के समीप बलभद्री नाले पर स्थित है। इस स्थल का नाम तुरतुरिया पड़ने का कारण यह है कि बलभद्री नाले का जलप्रवाह चट्टानों के माध्यम से होकर निकलता है तो उसमें से उठने वाले बुलबुलों के कारण तुरतुर की ध्वनि निकलती है। जिसके कारण उसे तुरतुरिया नाम दिया गया है। इसका जलप्रवाह एक लम्बी संकरी सुरंग से होता हुआ आगे जाकर एक जलकुंड में गिरता है जिसका निर्माण प्राचीन ईटों से हुआ है। जिस स्थान पर कुंड में यह जल गिरता है वहां पर एक गाय का मुख बना दिया गया है जिसके कारण जल उसके मुख से गिरता हुआ दिखाई पड़ता है। गोमुख के दोनों ओर विष्णु जी की दो प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं | इनमें से एक प्रतिमा खडी हुई स्थिति में है तथा दूसरी प्रतिमा में विष्णुजी को शेषनाग पर बैठे हुए दिखाया गया है। इस स्थान पर शिवलिंग काफी संख्या में पाए गए हैं इसके अतिरिक्त प्राचीन पाषाण स्तंभ भी काफी मात्रा में बिखरे पड़े हैं जिनमें कलात्मक खुदाई किया गया है। इसके अलावा कुछ शिलालेख भी यहां स्थापित हैं। कुछ प्राचीन बुध्द प्रतिमाएं भी यहां स्थापित हैं। इस स्थान पर बौध्द, वैष्णव तथा शैव धर्म (भगवन शिव के अनुयायी) से संबंधित मूर्तियों का पाया जाना इस तथ्य को बल देता है कि यहां कभी इन तीनों संप्रदायो की मिलीजुली संस्कृति रही होगी। मान्यता है कि यहां बौध्द विहार थे जिनमे बौद्ध धर्म में पूर्ण रूप से दीक्षित महिलाओं का निवास था। सिरपुर के समीप होने के कारण इस बात को अधिक बल मिलता है कि यह स्थल कभी बौध्द संस्कृति का केन्द्र रहा होगा। यहां से प्राप्त शिलालेखों की लिपि से ऎसा अनुमान लगाया गया है कि इन प्रतिमाओं का समय 8-9 वीं शताब्दी है। प्राचीन समय से लेकर आज भी यहां स्त्री पुजारिनों की नियुक्ति होती है, यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि हिन्दू समाज प्रारंभ से ही पुरुष प्रधान नहीं था | सालो पहले भी स्त्रियों को पुरुषो के समान सम्मान प्राप्त था | पूष माह में यहां तीन दिवसीय मेला लगता है तथा बड़ी संख्या में श्रध्दालु यहां आते हैं। धार्मिक एवं पुरातात्विक स्थल होने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण भी यह स्थल पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। मनोकामना पूर्ण होने पर बलिप्रथा भी यहाँ प्रचलित है |