श्रीलक्ष्मी माटीकला की धार | The Voice TV

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श्रीलक्ष्मी माटीकला की धार

Date : 11-Nov-2023

  वोकल फार लोकल और आत्मनिर्भर भारत की राह पर बढ़ते उत्तर प्रदेश के कदम इस दीपावली पर चीनी उत्पादों के लिए चुनौती साबित होंगे। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए कारगर प्रयास का ही परिणाम है कि विन्ध्य क्षेत्र के माटी कलाकारों के उत्पाद का बोलबाला उत्तर प्रदेश समेत बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ, झारखंड आदि प्रदेशों में है और हुनरमंद कलाकारों की भी एक अलग पहचान है। पुश्तैनी कारोबार संभाले हुनरमंद मिट्टी को अलग-अलग स्वरूप में ढाल प्राण फूंक उसे जीवंत बनाने में लगे हैं। वे उत्कृष्ट कला की बारीकियों के साथ प्रकृति, प्रेम, आस्था एवं एकता का महत्व बता रहे हैं। इससे कद्रदान एवं खरीदार दोनों वर्षों पुरानी इस कला से रूबरू हो रहे हैं।

दीपोत्सव पर्व पर हर कोई लक्ष्मी-गणेश का पूजन अवश्य करता है। बात जब लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों की हो तो चुनार में बनने वाली प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियां उत्तर प्रदेश और इसके समीपवर्ती कई प्रदेशों में पूजी जाती हैं। चुनार में बनी पीओपी की मूर्तियां सबसे अधिक पूर्वांचल समेत लखनऊ, कानपुर, रायबरेली, प्रयागराज आदि जनपद के साथ कई प्रांतों में बिकती हैं। यही वजह है कि पीओपी मूर्ति उद्योग ने अपनी अलग पहचान स्थापित कर ली है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, बंगाल, छत्तीसगढ, झारखंड आदि प्रदेशों के विभिन्न इलाकों में यहां बनी मूर्तियां काफी पसंद की जाती हैं। इस बार भी दीपावली पर पूजे जाने वाले विघ्नहर्ता भगवान गणेश और धन की देवी मां लक्ष्मी की मूर्तियों की अच्छी बिक्री हुई है। इससे स्थानीय उत्पादक और मूर्ति विक्रेता काफी खुश हैं।

हम बात कर रहे हैं चुनार के माटी कारीगरों की, जो पुश्तों से इस काम को करते चले आए हैं। इनके हाथों में हुनर ऐसा है कि लक्ष्मी-गणेश की जीवंत मूर्तियां बना देते हैं। इन्हीं मूर्तियों के सहारे सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी चलती है। मूर्तिकला व्यवसाय से जुड़े लोग साल के 11 महीने काम करते हैं और एक महीने दुकानें लगाकर बिक्री से मिले पैसों से गुजारा करते हैं। उत्कृष्ट कला और सजावट के कारण ही यहां की मूर्तियों की डिमांड देश के विभिन्न प्रदेश में है। वैसे मीरजापुर जनपद हमेशा से ही पत्थर और मिट्टी से बने समानों के लिए मशहूर रहा है। चुनार के सैकड़ों परिवारों के लोग पहले लाल मिट्टी से बने बर्तन और सजावटी समान बनाते थे। कप-प्लेट, बरनी, गुलदस्ता रखने का पॉट जैसे दर्जनों समान यहां पर बनाया जाता रहा है, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में इन चीनी-मिट्टी से बनी चीजों की मांग कम हुई तो यह उद्योग बंद हो गया और लोग बेरोजगार हो गए। ऐसे में जब कोई काम नहीं बचा तो लोग प्रकाश पर्व दीपावली पर हर घर पूजे जाने की परंपरा के तहत प्लास्टर ऑफ पेरिस से गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां बनाने लगे। अपनी उत्कृष्ट कला के चलते यहां पर बनी मूर्तियों की मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

11 महीने काम और एक महीने दुकान

कारीगर साल के 11 महीने घरों में लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां बनाते हैं और यह मूर्तियां साल के एक महीने बिकती हैं। व्यवसाय से जुड़े लाल बहादुर कहते हैं कि हम लोग सालभर दिन-रात लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों का निर्माण सपरिवार करते हैं। लक्ष्मी-गणेश की ही कृपा से हम लोगों का परिवार सालभर गुजर-बसर करता है। मूर्ति विक्रेता विजय वर्मा कहते हैं कि चुनार कस्बे की करीब 25 प्रतिशत आबादी मूर्तिकला से जुड़ी है। लोग साल भर घरों में मूर्तियां बनाते हैं। फिर एक महीने में इन मूर्तियों की बिक्री होती है। इनसे जो पैसे मिलते हैं उससे हम सबका परिवार चलता है। अनुमान के मुताबिक करीब 20 करोड़ का कारोबार एक महीने में हो जाता है। लोगों की पसंद और मांग के हिसाब से मूर्तियों का आकार व स्वरूप बदलता रहता है। कारीगर डिमांड के हिसाब डाई तैयार करते हैं। इस बार रंगाई में प्लास्टिक पेंट का इस्तेमाल किया गया।


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