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पुण्यतिथि विशेष:- सफल इंजीनियर डॉ. एम. विश्वेश्वरैया के अनसुने किस्से और सिद्धांत

Date : 14-Apr-2024

 भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की आज पुण्यतिथि है। विश्वेश्वरैया शिक्षा की महत्ता को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। यही कारण है कि उन्हें देश के एक महान इंजीनियर के तौर पर जाना जाता है। 

विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर, 1861 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उन्हीं की याद में भारत में हर साल 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे (अभियंता दिवस) मनाया जाता है। वह 100 वर्षों से अधिक जीवित रहे थे और अंत तक सक्रिय जीवन ही व्यतीत किया था। उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर है कि एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, 'आपके चिर यौवन (दीर्घायु) का रहस्य क्या है?' तब डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरैया घर पर नहीं है और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?' 

अंग्रेजों को लेकर भी उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी प्रसिद्ध है। दरअसल, यह उस समय की बात है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था इसलिए वहां बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। 

 

अचानक उस व्यक्ति ने उठकर ट्रेन की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती ट्रेन तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा, 'जंजीर किसने खींची है?' उस व्यक्ति ने बेझिझक उत्तर दिया, 'मैंने खींची है।' कारण पूछने पर उसने बताया, 'मेरा अनुमान है कि यहां से लगभग एक फर्लांग (220 गज) की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।' 

गार्ड ने पूछा, 'आपको कैसे पता चला?' वह बोला, 'श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है। पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।' गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुंचा तो यह देखकर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं। तब तक दूसरे यात्री भी वहां आ पहुंचे। 

जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा, 'आप कौन हैं?' उस व्यक्ति ने कहा, 'मैं एक इंजीनियर हूं और मेरा नाम है डॉ. एम. विश्वेश्वरैया है।' यह नाम सुन ट्रेन में बैठे सारे अंग्रेज स्तब्ध रह गए। 

दरअसल उस समय तक देश में डॉ. विश्वेश्वरैया की ख्याति फैल चुकी थी। ट्रेन में बैठे सारे लोग उनसे माफी मांगने लगे। तब डॉ. विश्वेश्वरैया ने उत्तर दिया, 'आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है।' 

मोक्षागुंडम विश्वेश्वरैया के सिद्धांत इस प्रकार है - 

1.लगन से काम करो | मेहनत से जी न चुराओं | आराम कड़ी मेहनत के उपरांत ही अच्छा लगता है | 

2.निर्धारित कार्यों का समय नियत करो | समय पर काम करने की आदत डालने से काम अधिक भी होता है और अच्छा भी | इसलिए सबसे जरूरी है काम को निश्चित समय पर पूरा करना | यदि ऐसा नहीं करेंगे तो काम की अवधि बढ़ती रहेगी और अंतत: काम पूरा नहीं होगा | 

3.यह सोचते रहो कि आज की अपेक्षा कल किस तरह अधिक अच्छा काम हो सकता है | जो सिख चुके हो, उससे अधिक सीखने का प्रयत्न करो | सोचो, योजना बनाओ, गुण-दोषों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरांत काम में हाथ डालो| 

4.अहंकारी न बनो | अपना स्वभाव नम्र बनाओ तथा साथियों के साथ मिलजुलकर काम करने की आदत डालो | 

उनकी जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया | जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया | 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया | 

 

 
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