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Science & Technology

सौर जल अपघटन से हरित ऊर्जा

Date : 30-Jan-2023

 काफी लंबे समय से वैज्ञानिक ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए सूरज की ऊर्जा और पानी का उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं; लगभग उसी तरह जैसे पौधे प्रकाश संश्लेषण के दौरान करते हैं। सूर्य के प्रकाश का उपयोग करते हुए पानी के अणुओं को तोड़ने की वर्तमान तकनीक इतनी कार्यक्षम नहीं है कि इसे व्यवसायिक रूप से अपनाया जा सके। अलबत्ता, हालिया शोध से कुछ उम्मीद जगी है।

पूर्व में सूर्य की ऊर्जा से पानी के अणुओं को विभाजित करने के प्रयासों में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अणुओं के बंधन को तोड़ने के लिए ऊर्जावान फोटॉन की आवश्यकता होती है। इसके लिए कम तरंग लंबाई यानी अधिक ऊर्जावान (पराबैंगनी और दृश्य प्रकाश के कम) फोटॉन यह काम कर सकते हैं। लेकिन सूर्य से जो रोशनी पृथ्वी तक पहुंचती है उसमें 50 प्रतिशत तो इन्फ्रारेड (अवरक्त) फोटॉन होते हैं जिनमें पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती।  

हालिया नई तकनीक में ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के बंधन को तोड़ने के लिए दो रणनीतियां आज़माई गई हैं। 

पहली तकनीक में प्रकाश-विद्युत-रासायनिक सेल (फोटोइलेक्ट्रोकेमिकल सेल, पीईसी) का उपयोग किया जाता है। यह उपकरण एक बैटरी के समान होता है। इसके दो इलेक्ट्रोड एक तरल इलेक्ट्रोलाइट में डूबे रहते हैं। इनमें से एक इलेक्ट्रोड एक छोटे सौर सेल की तरह काम करता हैं - सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करके उसकी ऊर्जा को विद्युत आवेश में बदल देता है। ये आवेश इलेक्ट्रोड पर उपस्थित उत्प्रेरकों को मिलते हैं और वे पानी के अणु विभाजित कर देते हैं। एक इलेक्ट्रोड पर हाइड्रोजन गैस और दूसरे पर ऑक्सीजन गैस उत्पन्न होती है। 

सर्वोत्तम पीईसी सूर्य के प्रकाश की लगभग एक-चौथाई ऊर्जा को हाइड्रोजन ईंधन में परिवर्तित करता है। लेकिन इसके लिए संक्षारक इलेक्ट्रोड की आवश्यकता होती है जो काफी तेज़ी से प्रकाश-अवशोषक अर्धचालक को नष्ट करता है।   

मोनोलिथिक फोटोकैटेलिटिक सेल नामक दूसरी रणनीति में बैटरी जैसा उपकरण उपयोग न करके प्रकाश-अवशोषक अर्धचालक को सीधे पानी में डुबाकर रखा जाता है। यह अर्धचालक सूर्य के प्रकाश का अवशोेषण करके विद्युत आवेश उत्पन्न करता है जो इसकी सतह पर उपस्थित उत्प्रेरक धातुओं को मिलता और वे पानी के अणु विभाजित कर देती हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन पास-पास उत्पन्न होते हैं और फिर से जुड़कर पानी बना देते हैं।     

फोटोकैटेलिटिक सेल की दक्षता काफी कम है और सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का केवल 3 प्रतिशत ही हाइड्रोजन में परिवर्तित होता है। इसका एक समाधान अर्धचालकों के आकार को पारंपरिक सौर पैनलों के बराबर करना है। लेकिन पानी को विभाजित करने वाले अर्धचालक पारंपरिक सिलिकॉन सौर पैनलों की तुलना में काफी महंगे होते हैं जिसके कारण इनका उपयोग घाटे का सौदा है।

इस नए अध्ययन में युनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के रसायनज्ञ ज़ेटियन मी ने फोटोकैटेलिटिक उपकरण में एक बड़े-से लेंस का उपयोग किया। लेंस ने सूर्य के प्रकाश को एक छोटे-से क्षेत्र पर केंद्रित कर दिया जिससे पानी के अणुओं को तोड़ने वाले अर्धचालक के आकार और लागत को कम किया जा सका। मी ने एक परिवर्तन यह भी किया कि पानी के तापमान को 70 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा दिया जिससे अधिकांश हाइड्रोजन और ऑक्सीजन गैसों को पुन: पानी में परिवर्तित होने से रोका जा सका। 

मी द्वारा बनाया गया नवीनतम उपकरण न केवल पराबैंगनी और दृश्य प्रकाश का उपयोग करता है बल्कि कम ऊर्जावान इन्फ्रारेड फोटोन के साथ भी काम करता है। नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इन परिवर्तनों की मदद से वैज्ञानिक सूर्य की 9.2 प्रतिशत ऊर्जा को हाइड्रोजन ईंधन में परिवर्तित कर पाए।

मी के अनुसार पीईसी की तुलना में फोटोकैटेलिटिक सेल का डिज़ाइन काफी आसान है और बड़े पैमाने पर उत्पादन से इसकी लागत में और कमी आएगी। इसके अलावा नया सेटअप थोड़ी कम कुशलता से ही सही लेकिन समुद्री जल जैसे सस्ते संसाधन के साथ भी काम करता है। समुद्री जल को कार्बन-मुक्त ईंधन में परिवर्तित करना हरित ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान होगा। बहरहाल, इस तरह के उपकरण के व्यावसायिक उपयोग में कई समस्याएं आएंगी। जैसे एक समस्या तो यह होगी कि हाइड्रोजन व ऑक्सीजन गैसों को दूर-दूर कैसे रखा जाए क्योंकि अन्यथा उनकी अभिक्रिया क्रिया काफी विस्फोटक हो सकती है।

 
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